कांवड़ यात्रा क्यों की जाती है? जानिए इसके पीछे का इतिहास और मान्यताएं

कांवड़ यात्रा एक धार्मिक यात्रा है, जिसमें शिव भक्त (कांवड़िए) गंगाजल लेने हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख या अन्य तीर्थों तक पैदल जाते हैं.

कांवड़िए गंगा से जल लाकर अपने क्षेत्र के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। मान्यता है कि इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं.

इस यात्रा की जड़ें पौराणिक कथाओं में हैं। खासकर समुद्र मंथन और भगवान शिव के विषपान की कथा से जुड़ी हैं.

समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकला, जिसे पीकर शिव ने संसार की रक्षा की। विष के असर को शांत करने के लिए शिव को जल चढ़ाया गया.

ऐसा माना जाता है कि गंगाजल शिव के विषपान से उत्पन्न ज्वर और ताप को शांत करता है, इसलिए भक्त शिवजी पर गंगाजल चढ़ाते हैं.

कांवड़िए पूरी यात्रा पैदल करते हैं, इसे भक्ति, तपस्या और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है.

हर उम्र के पुरुष, युवा, यहां तक कि महिलाएं भी कांवड़ यात्रा में हिस्सा लेती हैं, इनकी संख्या लाखों में होती है.

यात्रा के दौरान “बोल बम” के जयकारे, डीजे पर भक्ति गीत और नृत्य से माहौल भक्तिमय रहता है.

कांवड़ यात्रा के दौरान रास्तों पर भगवा रंग की सजावट, शिव झांकियां और भंडारे लगाए जाते हैं.

लोग मानते हैं कि कांवड़ यात्रा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है.