चमत्कारों से भरा मुण्डेश्वरी धाम, बिना बलि के होती है पूजा !
आप विश्व के बहुत से विख्यात मंदिरों से परिचित होंगे , पर क्या आप बिहार के कैमुर जिले में स्थित प्राचीन मुंडेश्वरी मंदिर को जानते है जो अपने चमत्कारों के लिए मश़हूर है.
मुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण 108 ईस्वी में हुआ था, यह गुप्त काल (चौथी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी) का माना जाता है।
मंदिर के पूर्वी खंड में देवी मुण्डेश्वरी की पत्थर से बनी भव्य प्रतिमा है, जहाँ माँ वाराही रूप में विराजमान है.
मां मुंडेश्वरी मंदिर के गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग और भगवान गणेश की प्रतिमा भी स्थापित है.
मुण्डेश्वरी धाम अपने चौकाने वाले बलि "सात्विक बलि" के लिए विख्यात है.
यहाँ बकरे की बलि दी जाती है , आपको जान कर हैरानी होगी कि बलि के बाद भी बकरे को कोई छति नहीं पहुँचती.
मंदिर के संबंध में मान्यता है कि चंड-मुंड असुरों के नाश के लिए देवी प्रकट हुई थीं .
चंड की मृत्यु के बाद मुंड इसी पहाड़ी में छिप गया ,यहीं माँ ने उसका वध किया ,जिस कारण इस मंदिर को मुंडेश्वरी माता कहा जाने लगा.
कैमूर पहाड़ियों के मूल निवासी चेरो जनजाति के लोगों ने मुंडेश्वरी को मुख्य देवी के रूप में स्थापित किया। मंदिर शैव और शाक्त दोनों संप्रदायों के लिए महत्वपूर्ण है.
मुंडेश्वरी मंदिर न केवल धार्मिक मान्यताओं बल्कि अपने अनूठे इतिहास, वास्तुकला और अनुष्ठानों के लिए भी प्रसिद्ध है.
पुरातत्वविदों के अनुसार, मंदिर का शिलालेख 349 ई. का है, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाता है, मंदिर की नक्काशी और मूर्तियों उत्तर गुप्तकालीन की बताई जाती हैं.
निकटतम रेलवे स्टेशन "मोहनिया - भभुआ रोड" है ,फिर सड़क मार्ग से 22 किमी दूर है. लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा , निकटतम हवाई अड्डा है, जो मंदिर से 102 किमी की दूरी पर है.