कांटों वाली भटकटैया है 'रामबाण' दवा, खांसी-दमा, पथरी, बुखार में आएगी काम

भटकटैया कांटेदार होने के बावजूद आयुर्वेद में 'दु:स्पर्शा' कहलाती है. छूने में कठिन, पर फायदे अनगिनत हैं.

पीले-हरे कांटों वाले पौधे कंटकारी/व्याघ्री के फल पहले हरे-सफेद धारियों वाले और पकने पर पीले हो जाते हैं.

आयुर्वेद के अनुसार भटकटैया की तासीर गर्म और स्वाद कड़वा-तीखा होता है.

यह पाचक, कफ-वात नाशक, पसीना लाने वाली और बुखार हरने वाली जड़ी-बूटी है.

पुरानी खांसी, दमा और छाती के कफ में कंटकारी का काढ़ा रामबाण.

बच्चों में भी इसके फूलों का चूर्ण+शहद से राहत मिलती है.

दमा में भुनी हींग, सेंधा नमक और भटकटैया के काढ़े का मिश्रण बेहद लाभकारी माना गया है.

बुखार में इसका काढ़ा शरीर का तापमान संतुलित करता है, सिरदर्द और बेचैनी दूर करता है. यह पाचन शक्ति भी बढ़ाता है.

भटकटैया पथरी में भी कारगर है. जड़ का चूर्ण दही के साथ लेने से पथरी गलकर बाहर निकलने में मदद मिलती है.

दांत दर्द, आंख दर्द, गले की सूजन, उल्टी, पेट दर्द, जुकाम, कमजोर पाचन में इसका काढ़ा/चूर्ण उपयोगी है.

यह पूरी तरह प्राकृतिक औषधि है, लेकिन तासीर गर्म होने से गर्भवती महिलाओ और पित्त रोगी के लिए सही नहीं है.