उदासी या सोशल मीडिया की लत? कहीं आप भी तो नहीं हैं इसके शिकार

जब भी हम परेशान या उदास होते हैं, तो हमारा हाथ खुद ही फोन की तरफ बढ़ जाता है और हम रील्स स्क्रॉल करने लगते हैं.

अपनी असल जिंदगी की परेशानियों, तनाव या अकेलेपन से ध्यान भटकाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना ही 'डिजिटल एस्केपिज्म' कहलाता है.

उदास दिमाग तुरंत राहत ढूंढता है. सोशल मीडिया पर लाइक्स, कमेंट्स या मजेदार रील्स देखते ही दिमाग में 'डोपामाइन' (feel good hormones) रिलीज होता है.

खाली बैठने पर नकारात्मक विचार घेरने लगते हैं. सोशल मीडिया रंग-बिरंगे कंटेंट और मीम्स के जरिए इस खालीपन को तुरंत भर देता है.

स्क्रीन पर दुनिया को देखकर हमें लगता है कि हम अकेले नहीं हैं. यह हमें जुड़ाव का एक झूठा अहसास देता है.

तनाव के बावजूद घंटों फोन चलाना 'डूम-स्क्रॉलिंग' है. दिमाग इस उम्मीद में स्क्रॉल करता रहता है कि अगला वीडियो और मजेदार होगा.

यह आदत आपकी असल समस्या को हल नहीं करती, बल्कि उसे कुछ समय के लिए दबा देती है, जो बाद में बड़े तनाव का कारण बनती है.

दूसरों की रील्स और 'परफेक्ट लाइफ' देखकर लोग अपनी असल जिंदगी से और ज्यादा निराश और चिड़चिड़े होने लगते हैं.

रील्स की जगह असल दुनिया में लौटें. प्रकृति के साथ समय बिताएं, डायरी लिखें या किसी दोस्त से दिल की बात शेयर करें.