सावन में शिवभक्ति का पर्व है कांवड़ यात्रा, समुद्र मंथन से हुई थी यात्रा की शुरूआत, जानें कैसी होती थी पहले की कावड़
सावन आते ही पूरे उत्तर भारत में “बोल बम” की गूंज सुनाई देने लगती है. लाखों शिवभक्त गंगाजल लाने की यात्रा पर निकलते हैं.
कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, यह आस्था, संकल्प और तपस्या की मिसाल बन चुकी है.
इस यात्रा की शुरुआत
समुद्र मंथन
से जुड़ी है, जब भगवान शिव ने विष पान कर सृष्टि की रक्षा की थी.
शिवजी की तपन शांत करने के लिए देवताओं ने उन्हें गंगाजल अर्पित किया — तभी से शुरू हुई ये परंपरा.
गंगाजल को शिवलिंग पर चढ़ाना पुण्यकारी
माना गया है, जिससे पापों का नाश और इच्छाओं की पूर्ति होती है.
पहले यह यात्रा सिर्फ साधु-संत करते थे, अब हर उम्र और वर्ग के लोग कांवड़ उठाने लगे हैं.
कुछ लोग
बाइक और ट्रक
से भी शामिल होते हैं, पर पैदल चलने की परंपरा आज भी सबसे पवित्र मानी जाती है.
कांवड़ यात्रा में भक्त कई नियमों का पालन करते हैं — नंगे पांव चलना, सात्विक भोजन और संयम जरूरी होता है.
ये यात्रा केवल शिवभक्ति नहीं सिखाती, बल्कि सेवा, अनुशासन और एकता का गहरा संदेश भी देती है.