हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित हैंजिस चंद्र मास में सूर्य की कोई संक्रांति (राशि परिवर्तन) नहीं होती, उसे ही अधिकमास या मलमास कहा जाता है.
सूर्य और चंद्र मास के बीच समय के संतुलन को ठीक करने के लिए इस महीने का निर्माण होता हैं. यह स्थिति हर 32 महीने 16 दिन के अंतराल पर बनती है.
धर्मशास्त्रों के अनुसार मलमास मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है, पहला 'अधिकमास' और दूसरा बेहद दुर्लभ माना जाने वाला 'क्षयमास'.
जब एक ही चंद्र मास में दो सूर्य संक्रांतियां पड़ जाती हैं, तो उसे क्षयमास कहते हैं. यह स्थिति बेहद दुर्लभ है और लगभग 141 वर्षों में एक बार आती है.
शास्त्रों के अनुसार, यह समय भौतिक सुखों या सांसारिक उत्सवों का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए निर्धारित किया गया है.
आम लोग इसे भले ही 'अशुभ' मानकर नए काम टाल देते हैं, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में इसे बेहद पवित्र और भगवान विष्णु का प्रिय महीना बताया गया है.
भगवान विष्णु का पसंदीदा समय होने के कारण ही इस महीने को 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से भी पूजा जाता हैं. संत और विद्वान इसे साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानते हैं.
पुराणों के अनुसार, इस विशेष महीने में किए गए जप, तप, दान, व्रत और भगवान विष्णु की आराधना का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है.
इस दौरान व्यक्ति को मन की शुद्धि के लिए भगवान विष्णु की पूजा, गीता व पुराणों का पाठ, मंत्र जाप, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य करने चाहिए.