मूंग से मालामाल होंगे किसान, जानें कम समय और कम लागत का मंत्र
भारतीय कृषि में मूंग एक ऐसी 'शॉर्ट-कट' फसल है जो बहुत कम समय और लागत में किसानों को शानदार रिटर्न देती है.
मूंग सिर्फ मुनाफा ही नहीं देती, बल्कि अपनी जड़ों के जरिए मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती है जिससे अगली फसल और भी अच्छी होती है.
मूंग को साल में तीन बार उगाया जा सकता है. जायद (मार्च-अप्रैल) की मूंग सबसे लोकप्रिय है, जबकि खरीफ (जून-जुलाई) में भी इसे बड़े स्तर पर लगाया जाता है.
मूंग के लिए 25°C से 35°C का तापमान आदर्श है. दोमट या काली मिट्टी इसके लिए सबसे बेहतर मानी जाती है, बस खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए.
बेहतर पैदावार के लिए पूसा विशाल, सम्राट, PDM-139, SML-668 और विराट जैसी वैज्ञानिक किस्मों का ही चयन करें.
प्रति एकड़ 12-15 किलो बीज पर्याप्त है. बुवाई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम और राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना न भूलें; यह बीमारियों से सुरक्षा देता है.
कतार से कतार की दूरी 30 सेमी और पौधों के बीच 10 सेमी की दूरी रखें. सही फासले से पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त हवा और रोशनी मिलती है.
बुवाई के समय 2-3 ट्रॉली गोबर खाद के साथ DAP और सल्फर का प्रयोग करें. सल्फर दालों में चमक और तेल की मात्रा बढ़ाने में मदद करता है.
गर्मी (जायद) की मूंग में 3-4 सिंचाई जरूरी हैं. फूल आने और दाना भरते समय नमी का होना फसल की गुणवत्ता के लिए अनिवार्य है.
सफेद मक्खी और पीला मोजेक वायरस फसल को बर्बाद कर सकते हैं. समय रहते विशेषज्ञों की सलाह पर कीटनाशकों का छिड़काव करें.
जब फलियां 80% तक काली या भूरी दिखने लगें, तब कटाई का काम शुरू कर दें. ज्यादा देर करने से फलियां खेत में ही चटक सकती हैं.
वैज्ञानिक तकनीक से प्रति एकड़ 7-8 क्विंटल तक उपज ली जा सकती है. कम लागत और कम मेहनत में यह किसानों के लिए 'गोल्डन क्रॉप' है.