पोखरण-II: जब भारत ने दुनिया को चौंकाया और परमाणु शक्ति बना
1 से 13 मई 1998 के बीच भारत ने राजस्थान के पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण कर इतिहास रचा था. 11 मई को दोपहर 3:45 बजे 'ऑपरेशन शक्ति' के तहत परीक्षण शुरू हुए.
इस महान उपलब्धि के उपलक्ष्य में हर साल 11 मई को 'नेशनल टेक्नोलॉजी डे' मनाया जाता है, जो हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के योगदान को समर्पित है.
भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 1974 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में किया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों के डर से अगले दो दशकों तक पूर्ण परमाणु शक्ति बनने का सपना अधूरा रहा.
1995 में पी.वी. नरसिम्हा राव के समय परीक्षण की तैयारी हुई थी, लेकिन अमेरिकी CIA के सैटेलाइट्स ने इसे पकड़ लिया और भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण योजना टालनी पड़ी.
1998 में सत्ता में लौटते ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और आर. चिदंबरम को गुप्त रूप से परीक्षण की तैयारी करने की हरी झंडी दी.
CIA की नजरों से बचने के लिए वैज्ञानिक सेना की वर्दी में और छद्म नामों से काम करते थे. डॉ. कलाम का कोड नाम 'मेजर जनरल पृथ्वी राज' और आर. चिदंबरम का 'नटराज' रखा गया था.
वैज्ञानिक केवल रात में काम करते थे ताकि अमेरिकी जासूसी उपग्रह उनकी गतिविधियों को न देख सकें. रेत के टीलों को इस तरह व्यवस्थित किया जाता था कि वे हवा से बने प्राकृतिक टीले लगें.
11 मई को धमाके के बाद, वाजपेयी जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दुनिया को बताया कि भारत अब एक परमाणु संपन्न राष्ट्र है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के लिए इसे 'दशक की सबसे बड़ी विफलता' माना गया.
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने भारत की कड़ी निंदा की और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने दक्षिण एशिया को 'दुनिया की सबसे खतरनाक जगह' कहा था.
इन परीक्षणों के बाद भारत ने 'No First Use' की नीति अपनाई. इससे दुनिया में भारत का रुतबा बढ़ा और उसे एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में पहचान मिली.