अंग्रेजी क्रूरता का गवाह है ये इमली का पेड़, एक साथ 52 क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी

अगर आप इस 15 अगस्त पर देशभक्ति का अनुभव लेना चाहते हैं तो ऐसी जगह जाएं जहां आजादी की असली कीमत दिल से महसूस हो. 

हम बात कर रहे हैं फतेहपुर में स्थिर बावनी इमली के पेड़ की. यहां 28 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों ने एक सात 52 क्रांतिकारियों को फांसी दी थी. यह पेड़ आज भी उस जगह खड़ा है. 

लेकिन कहा जाता है कि उस दिन के बाद से इसमें नया पत्ता नहीं आया. यह सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि आजादी की सबसे दर्दनाक कहानियों की गवाह है. 

यहां पहुंचकर आपको केवल इतिहास नहीं बल्कि वो चींखे महसूस होगी जो क्रांतिकारियों को फांसी देते वक्त सुनाई दी थी. भले ही इतिहास के पन्नों में ये 52 गुमनाम है लेकिन इनके कारनामों ने उस समय अंग्रेजी हुकूमत की नाम के दम किया था. 

यह कहानी है अमर शहीद ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों की. ठाकुर जोधा सिंह राजपूत जाति से थे और उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अटैया रसूलपुर गांव के रहने वाले थे. 

ठाकुर जोधा सिंह झांसी की रानी लक्ष्मी बाई से काफी प्रभावित थे. जोधा सिंह वे अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की क्रांति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. वह गुरिल्ला युद्ध में काफी माहिर थे. 

कई बार जोधा अंग्रेजों को चकमा देने में सफल रहे. हालांकि जैसे कि कई स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुआ था वैसा ही जोधा के साथ भी हुआ. वे 28 अप्रैल 1858 को अपने 51 साथियों के साथ फतेहपुर जा रहे थे. 

उसी समय एक मुखबिर की सूचना पर कर्नल क्रिस्टाइज ने सभी को एक साथ बंदी बना लिया. फिर उसी दिन कर्नल क्रिस्टाइज इन सभी को खजुहा में स्थित एक विशालकाय इमली के पेड़ के पास लेकर पहुंचा. 

एक-एक कर अंग्रेजों ने पेड़ पर 52 फांसी के फंदे बनाए और ठाकुर जोधा सिंह सहित उनके 51 साथियों को इन फंदों पर लटका दिया. 

कर्नल क्रिस्टाइज की डर की वजह से इन सभी क्रांतिकारियों के शव एक महीने से अधिक पेड़ में ही लटके रहे. इस दौरान इनके केवल कंकाल बचे हुए थे.