टमाटर किसानों की बल्ले-बल्ले: खरपतवार बनेगा बीमारी का काल, वैज्ञानिकों ने खोजी नई राह

वैज्ञानिकों ने एक नया खुलासा किया है. तेजी से फैलने वाला एक आक्रामक खरपतवार अब टमाटर की फसलों को बचाएंगे.

इसे 'बायोचार' कहते हैं. यह लकड़ी या पौधों के अवशेषों को कम ऑक्सीजन में जलाकर बनाया गया काले कोयले जैसा पदार्थ है, जो मिट्टी की शक्ति बढ़ाता है.

शोधकर्ताओं ने दक्षिण चीन में पाए जाने वाले आक्रामक पौधे Solidago canadensis से यह बायोचार तैयार किया है, जो आमतौर पर पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता है.

टमाटर की 'बैक्टीरियल विल्ट' बीमारी दुनिया की सबसे विनाशकारी बीमारियों में से एक है. यह बैक्टीरिया सालों तक मिट्टी में जीवित रह सकता है.

अध्ययन में पाया गया कि जब बायोचार में सिलिकॉन मिलाया गया तो यह साधारण बायोचार के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हुआ.

450℃ पर तैयार सिलिकॉन-संशोधित बायोचार ने मिट्टी में हानिकारक बैक्टीरिया को 66% तक कम किया और बीमारी की घटनाओं में 59.1% की गिरावट लाई.

यह तकनीक सिर्फ बीमारी ही नहीं रोकती, बल्कि मिट्टी में कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात को 105% तक बढ़ा देती है, जिससे मिट्टी अधिक उपजाऊ बनती है.

बायोचार के इस्तेमाल से मिट्टी की 'कैटायन एक्सचेंज क्षमता' बढ़ती है. इसका मतलब है कि मिट्टी पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से रोक कर रख पाती है.

यह उपचार मिट्टी में Bacillus और Streptomyces जैसे 'मित्र बैक्टीरिया' की संख्या बढ़ाता है, जो पौधों की वृद्धि और सुरक्षा में सहायक होते हैं.

यह तकनीक पर्यावरण के लिए दोहरा फायदा देती है. पहला, खतरनाक खरपतवार का प्रबंधन और दूसरा, फसलों की जैविक सुरक्षा.

बायोचार के प्रयोग से खेती में रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होगी, जिससे लंबे समय में मिट्टी का स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों बेहतर रहेंगे.

हालांकि बड़े स्तर पर और अन्य फसलों पर इसके प्रभाव को लेकर शोध जारी है, लेकिन यह खोज टिकाऊ खेती की दिशा में एक बड़ा कदम है.