कभी सोचा है भगवान कृष्ण के मुकुट में क्यों सजता है मोरपंख? यहां जानें पौराणिक कथाएं
भगवान कृष्ण के मुकुट में सजा मोरपंख सिर्फ सुंदरता का आभूषण नहीं, बल्कि गहरी पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक अर्थों का प्रतीक है.
कहा जाता है, जन्म के बाद ज्योतिषी ने कान्हा के राहु दोष का उपाय मोरपंख बताया. मां यशोदा ने इसे मुकुट में सजाया और तब से यह उनका स्थायी श्रृंगार बन गया.
एक दिन मां यशोदा ने कान्हा को मोरपंख से सजाया. उनकी मोहक छवि देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो गए और मोरपंख सदा के लिए मुकुट का हिस्सा बन गया.
वन में बांसुरी सुनकर मोरों ने नृत्य किया और सेनापति मोर ने सुंदर पंख कान्हा को अर्पित किया. कृष्ण ने प्रेम से उसे सिर पर धारण किया.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मोरपंख सौभाग्य, प्रेम, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. यह सृष्टि के संतुलन और प्रकृति के साथ सामंजस्य को दर्शाता है.
गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में मोरपंख के रंगों को ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है. भागवत पुराण में इसे कृष्ण की लीलाओं का अभिन्न अंग बताया गया है.
मोरपंख को तमस यानी नकारात्मक ऊर्जा का नाशक माना जाता है. इसे घर में रखने से राहु-केतु दोष शांत होते हैं और मानसिक शांति मिलती है.
भक्त मानते हैं कि मोरपंख बिना कृष्ण भक्ति अधूरी है. यह केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि प्रेम और संरक्षण का प्रतीक है.
जन्माष्टमी से लेकर रोज़ की पूजा तक, मोरपंख कान्हा की पहचान है—भक्ति, प्रेम और प्रकृति के अटूट संबंध का सुंदर प्रतीक.