तापमान गिरते ही मीठा और तला-भुना खाने की चाहत बढ़ जाती है. इसके पीछे सिर्फ़ ठंड नहीं, बल्कि हार्मोन और जीन्स का खेल है.
वैज्ञानिक मानते हैं कि शरीर का मेटाबॉलिज्म सर्दियों में एनर्जी स्टोरेज को प्राथमिकता देता है. शरीर तापमान बनाए रखने के लिए अधिक ऊर्जा जलाता है.
ठंडे मौसम में भूख बढ़ाने वाला हार्मोन (घ्रेलिन) तेज हो जाता है, और संतुष्टि दिलाने वाले हार्मोन (लेप्टिन) का प्रभाव कम हो जाता है.
रिसर्च के अनुसार, ठंड में मस्तिष्क का एक हिस्सा 'जिफॉइड न्यूक्लियस' सक्रिय हो जाता है और दिमाग को अतिरिक्त कैलोरी की आवश्यकता का संकेत देता है.
PRKAR2A जैसे ख़ास जीन्स की पहचान हुई है जो मीठे और फैटी खाने की क्रेविंग को नियंत्रित करते हैं. जेनेटिक बदलाव भी स्वाद को प्रभावित करते हैं.
सूर्य की रोशनी कम होने से मूड पर असर पड़ता है. इससे कंफर्ट फूड (जो मन को सुख दे) की क्रेविंग बढ़ जाती है, जैसे हाई-कार्ब और हाई-फैट चीजें.
कम रोशनी से शरीर की सर्कैडियन रिद्म (बॉडी क्लॉक) बदलती है. इसका सीधा प्रभाव उन जीनों पर पड़ता है जो खाना कब खाना है, इस संकेत को नियंत्रित करते हैं.
यह प्रक्रिया हजारों साल पुरानी मानव विकास यात्रा से जुड़ी है. पुराने समय में शरीर भोजन की कमी के लिए ऊर्जा जमा करता था, जिसका असर आज भी हमारे जीन में है.
अच्छी बात यह है कि आप इसे नियंत्रित कर सकते हैं. पर्याप्त नींद, हल्की धूप और नियमित व्यायाम बनाए रखें.
रोशनी, गतिविधि और नींद तीनों सर्कैडियन रिद्म को नियमित रखते हैं और भूख के संकेत देने वाले जीनों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं.