केंद्रीय मंत्री शोभा करांदलाजे. (फाइल फोटो)
70-90 Hours Per Week Controversy: सरकार ने सोमवार (3 फरवरी) को संसद को बताया कि वह अधिकतम कार्य घंटों को बढ़ाकर 70 या 90 घंटे प्रति सप्ताह करने के किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है. हाल ही में कुछ कॉर्पोरेट नेताओं ने अधिकतम कार्य घंटों को बढ़ाकर 70 और यहां तक कि 90 घंटे प्रति सप्ताह करने का प्रस्ताव रखा था.
श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे (Shobha Karandlaje) ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में कहा, “अधिकतम कार्य घंटों को बढ़ाकर 70 या 90 घंटे प्रति सप्ताह करने का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है.”
श्रम मंत्री ने सदन को बताया कि श्रम समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए श्रम कानूनों का प्रवर्तन राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में किया जाता है. उन्होंने कहा कि केंद्रीय क्षेत्र में प्रवर्तन केंद्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र (CIRM) के निरीक्षण अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है, जबकि राज्यों में अनुपालन उनके श्रम प्रवर्तन तंत्र के माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है.
मौजूदा श्रम कानूनों के अनुसार, काम के घंटे और ओवरटाइम सहित काम करने की स्थितियों को फैक्ट्रीज़ एक्ट 1948 और संबंधित राज्य सरकारों के शॉप्स एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के माध्यम से विनियमित किया जाता है. कॉर्पोरेट क्षेत्र सहित अधिकांश प्रतिष्ठान शॉप्स एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट द्वारा शासित होते हैं.
70-90 घंटे के कार्य सप्ताह पर चर्चा के बारे में पिछले शुक्रवार को बजट-पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण ने अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा था कि सप्ताह में 60 घंटे से अधिक काम करने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि अपने डेस्क पर लंबे समय तक काम करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और जो व्यक्ति डेस्क पर 12 या उससे अधिक घंटे (प्रतिदिन) बिताते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य खराब या संघर्षपूर्ण होता है.
सर्वेक्षण में कहा गया है, “जबकि काम पर बिताए गए घंटों को अनौपचारिक रूप से उत्पादकता के लिए जरूरी माना जाता है, पिछले अध्ययन में प्रति सप्ताह 55-60 घंटे से अधिक होने पर प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों का दस्तावेजीकरण किया गया है,” सर्वेक्षण में पेगा एफ नफरदी बी, 2021 (Pega F Nafradi B) और ‘WHO/ILO संयुक्त अनुमानों से कार्य-संबंधित बीमारी और चोट के बोझ का एक व्यवस्थित विश्लेषण’ के निष्कर्षों का हवाला दिया गया है.
सैपियन लैब्स सेंटर फॉर ह्यूमन ब्रेन एंड माइंड द्वारा किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का हवाला देते हुए आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, “अपने डेस्क पर लंबे समय तक बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए समान रूप से हानिकारक है. जो व्यक्ति डेस्क पर 12 या उससे अधिक घंटे बिताते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य का स्तर व्यथित/संघर्षशील होता है, उनका मानसिक स्वास्थ्य स्कोर डेस्क पर दो घंटे से कम या उसके बराबर समय बिताने वालों की तुलना में लगभग 100 अंक कम होता है”.
WHO के एक अध्ययन का हवाला देते हुए, सर्वेक्षण में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर, अवसाद और चिंता के कारण सालाना लगभग 12 अरब दिन बर्बाद होते हैं, जो 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तीय नुकसान है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 द्वारा कार्य घंटे सप्ताह पर यह टिप्पणी लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक एसएन सुब्रह्मण्यन द्वारा सोशल मीडिया पर एक तीखी बहस छेड़ने के कुछ सप्ताह बाद आई थी, जब उन्होंने कहा था कि कर्मचारियों को घर पर बैठने के बजाय रविवार सहित सप्ताह में 90 घंटे काम करना चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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