विश्लेषण

‘अगर गांवों को बिजली-इंटरनेट नहीं मिला, तो बन जाएंगे दो भारत’… पढ़ें देश के महान वैज्ञानिक का वो ऐतिहासिक इंटरव्यू

Indian Scientific System: भारतीय डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जनक प्रो. लालजी सिंह की जन्म जयंती के अवसर पर उनकी एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार को याद करना उचित होगा. यह साक्षात्कार *Harmony Celebrate Age* में प्रकाशित हुआ था. इसमें प्रो. सिंह ने न केवल अपनी वैज्ञानिक यात्रा का जिक्र किया, बल्कि भारतीय जनसंख्या की जैविक विविधता को समझने में ‘मानव विज्ञान सर्वेक्षण (Anthropological Survey of India)’ के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया. उन्होंने 4,365 विभिन्न जनसंख्या समूहों पर किए गए ASI के अध्ययन को आधार बनाते हुए डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से भारत की आनुवंशिक विविधता को समझने की दिशा दिखाई. आज भी यह साक्षात्कार प्रासंगिक है क्योंकि इसमें भारत में वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक न्याय की चुनौतियों पर गहन चिंतन है.

भारत की अनुपम जैविक विविधता

प्रो. सिंह के अनुसार, भारत विश्व में मानव विविधता के सबसे बड़े केंद्रों में से एक है. यहां 4,365 स्पष्ट रूप से परिभाषित जनसंख्या समूह हैं, जो विभिन्न जातीय समूहों, जातियों और जनजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. भाषा, सामाजिक संरचना, वेशभूषा, भोजन की आदतें, विवाह प्रथाएं, शारीरिक बनावट और आनुवंशिक संरचना में अपार विविधता है. देश की भौगोलिक और जलवायु विविधता भी अद्वितीय है, एक क्षेत्र में बर्फ पड़ रही हो तो दूसरे में बाढ़ और तीसरे में गर्मी का प्रकोप.

एक किसान पुत्र की वैज्ञानिक यात्रा (Father of DNA Fingerprinting)

प्रो. लालजी सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक गांव में किसान परिवार में हुआ. उन्होंने स्थानीय सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की और हाई स्कूल-इंटरमीडिएट के लिए रोज 14 किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ाई की. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से उन्होंने बीएससी और पीएचडी की, जहां उन्हें फ्रीशिप और छात्रवृत्ति मिली. बाद में कॉमनवेल्थ फेलोशिप पर वे 13 वर्ष तक यूनाइटेड किंगडम में रहे.

डॉ. पी.एम. भार्गव के निमंत्रण पर वे हैदराबाद के सेन्टर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में शामिल हुए. यहां उन्हें हर जरूरी उपकरण और शोध छात्र उपलब्ध कराए गए. प्रो. सिंह ने यहां डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया, जिसके परिणामस्वरूप ‘Nature’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उनके शोध प्रकाशित हुए और एक बार कवर पेज पर भी जगह मिली.

भारतीय विज्ञान व्यवस्था पर चिंतन (rural-urban divide)

प्रो. सिंह ने खुलकर स्वीकार किया कि भारत जैसे गरीब देश ने उन्हें वह सब कुछ दिया जो वे चाहते थे. लेकिन उन्होंने व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी भी बताई ‘हमारा सिस्टम काम नहीं करता.’ अगर संगठन का शीर्ष व्यक्ति उत्कृष्ट है तो काम चलता है, लेकिन अगर अगला व्यक्ति योग्यता के बजाय अन्य आधारों पर नियुक्त हो जाए तो सब कुछ बिखर जाता है.

सरकारों में भी यही स्थिति है, एक कदम आगे और एक पीछे, जिससे प्रगति धीमी हो जाती है. उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में योग्यता-आधारित प्रणाली बने, जहां नवाचार को बढ़ावा मिले. ताकि भारत के प्रतिभाशाली युवा सिलिकॉन वैली के बजाय स्वदेश में ही अपनी क्षमता सिद्ध कर सकें.

ग्रामीण-शहरी खाई: दो भारत की चिंता (Genome Foundation)

प्रो. सिंह सबसे ज्यादा चिंतित थे बढ़ती अमीर-गरीब और ग्रामीण-शहरी खाई से. स्वतंत्रता के बाद भारत की प्रगति की तुलना में वे खुद को एक उदाहरण मानते थे. लोकतंत्र और समान अवसर ही उनकी सफलता का आधार थे. लेकिन आज गांवों में बिजली, इंटरनेट, अच्छे स्कूल और शिक्षकों की कमी के कारण ज्ञान की पिछड़ी हुई पीढ़ी तैयार हो रही है.

उन्होंने कहा कि अगर यह खाई नहीं पटी तो दो भारत बन जाएंगे- एक गांवों और शहरी झुग्गियों में, जहां आनुवंशिक विकारों और ज्ञान की कमी होगी और दूसरा शहरों में, जहां सब कुछ उपलब्ध होगा. इस चिंता को दूर करने के लिए उन्होंने 2004 में ‘Genome Foundation’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जीनोमिक, प्रिसीजन और व्यक्तिगत चिकित्सा उपलब्ध कराना था.

बापू का सपना और हमारा दायित्व (Anthropological Survey)

साक्षात्कार के अंत में प्रो. सिंह ने महात्मा गांधी (बापू) का सपना दोहराया:

‘मैं उस भारत के लिए काम करूंगा जिसमें सबसे गरीब व्यक्ति को लगे कि यह उसका देश है… जिसमें कोई ऊंच-नीच न हो और सभी समुदाय पूर्ण सामंजस्य में रहें.’

प्रो. लालजी सिंह का जीवन और विचार हमें याद दिलाते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति को सामाजिक न्याय और समानता के साथ जोड़ना होगा. उनकी जन्म जयंती पर हम न सिर्फ उनके वैज्ञानिक योगदान को याद करें, बल्कि विविध भारत को एकजुट और समृद्ध बनाने की दिशा में काम करने का संकल्प भी लें.

भारत की आनुवंशिक विविधता को समझने और उसे देश की प्रगति में बदलने का कार्य आज भी जारी है. प्रो. सिंह की विरासत हमें प्रेरित करती है- विज्ञान को गांव तक पहुंचाओ, योग्यता को प्रोत्साहन दो और एक समावेशी, देखभाल करने वाले भारत का निर्माण करो.

यह भी पढ़ें:  छत्तीसगढ़ से नोएडा जा रहा था 80 किलो गांजा, डिंडोरी पुलिस ने फिल्मी स्टाइल में घेराबंदी कर दबोचा; लाखों की खेप बरामद

-भारत एक्सप्रेस 

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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