आज के समय में फिंगरप्रिंट हमारी पहचान का सबसे भरोसेमंद तरीका बन चुका है. मोबाइल का लॉक खोलना हो, आधार से पहचान सत्यापित करनी हो, बैंक में दस्तावेज़ों का मिलान करना हो या फिर किसी अपराध की जांच करनी हो हर जगह उंगलियों के निशान अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस तकनीक की नींव भारत में रखी गई थी. इसकी शुरुआत किसी आधुनिक लैब में नहीं, बल्कि 19वीं सदी के बंगाल में एक साधारण प्रशासनिक प्रयोग के रूप में हुई थी.
इस कहानी के केंद्र में ब्रिटिश अधिकारी विलियम जेम्स हर्शेल हैं. उनका जन्म 9 जनवरी 1833 को इंग्लैंड के स्लो शहर में हुआ था. वे एक ऐसे परिवार से आते थे जिसकी पहचान विज्ञान, खासकर खगोल विज्ञान, से जुड़ी थी. उनके दादा प्रसिद्ध खगोलविद विलियम हर्शेल थे. बाद में विलियम जेम्स हर्शेल ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में भारत आए और बंगाल में नियुक्त हुए. आगे चलकर वे भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) के अधिकारी बने.
28 जुलाई 1858 का दिन मानव पहचान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. इसी दिन हर्शेल ने पहली बार किसी व्यक्ति की पहचान दर्ज करने के लिए उसके हाथ के निशान का इस्तेमाल किया. उन्होंने एक स्थानीय ठेकेदार, राज्याधर कोनाई, से एक अनुबंध पर हाथ की छाप लगवाई. उस समय उनका मकसद केवल इतना था कि दस्तावेज़ों में धोखाधड़ी और नकली हस्ताक्षरों की समस्या से बचा जा सके.
शुरुआत में यह एक छोटा-सा प्रशासनिक प्रयोग था, लेकिन इसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले साबित हुए.
कुछ समय तक अलग-अलग लोगों के निशान देखने के बाद हर्शेल ने महसूस किया कि किसी भी दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने ही उंगलियों के निशानों को कई वर्षों तक रिकॉर्ड करके यह भी साबित किया कि ये समय के साथ बदलते नहीं हैं. जन्म से लेकर जीवन के अंतिम समय तक फिंगरप्रिंट लगभग समान बने रहते हैं.
यही खोज आगे चलकर आधुनिक पहचान प्रणाली की सबसे मजबूत आधारशिला बनी.
हर्शेल ने अपने अनुभव के आधार पर सरकारी दस्तावेज़ों में केवल हस्ताक्षर पर निर्भर रहने के बजाय फिंगरप्रिंट का उपयोग शुरू किया. उन्होंने पेंशन लेने वालों और अपराधियों की पहचान के लिए भी उंगलियों के निशान दर्ज कराने की व्यवस्था लागू की. इससे फर्जी पहचान, गलत भुगतान और पहचान छिपाने जैसी कई समस्याओं में उल्लेखनीय कमी आई.
धीरे-धीरे यह तरीका इतना प्रभावी साबित हुआ कि प्रशासनिक व्यवस्था में इसकी उपयोगिता बढ़ती चली गई.
हर्शेल के इस प्रयोग ने बाद में वैज्ञानिक फ्रांसिस गॉल्टन को प्रेरित किया. गॉल्टन ने फिंगरप्रिंट की वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रणाली विकसित की, जिससे इसे व्यवस्थित रूप से पहचान के लिए इस्तेमाल करना आसान हो गया. इसके बाद 1901 में स्कॉटलैंड यार्ड ने आधिकारिक रूप से फिंगरप्रिंट प्रणाली को अपनाया और फिर यह तकनीक दुनिया के कई देशों में फैल गई.
आज फॉरेंसिक साइंस, पुलिस जांच और पहचान सत्यापन की लगभग हर आधुनिक प्रणाली में फिंगरप्रिंट की महत्वपूर्ण भूमिका है.
विलियम जेम्स हर्शेल ने अपने अनुभवों और शोध को बाद में अपनी पुस्तक The Origin of Finger-Printing में भी दर्ज किया, जो 1916 में प्रकाशित हुई. उनकी पहल ने यह साबित कर दिया कि इंसान की सबसे अनोखी पहचान उसकी अपनी उंगलियों में छिपी होती है.
आज जब हम स्मार्टफोन को फिंगरप्रिंट से अनलॉक करते हैं, आधार के जरिए पहचान सत्यापित करते हैं या किसी बैंक में बायोमेट्रिक सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं, तब अनजाने में हम उसी विचार का उपयोग कर रहे होते हैं जिसकी शुरुआत 167 साल पहले भारत की धरती पर हुई थी.
यही वजह है कि 28 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक दिन की याद भी है जब मानव पहचान के सबसे भरोसेमंद और वैज्ञानिक तरीकों में से एक की नींव रखी गई थी. एक छोटा-सा प्रशासनिक प्रयोग आगे चलकर पूरी दुनिया की पहचान और फॉरेंसिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन जाएगा, शायद उस समय किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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