HbA1c test accuracy diabetes India study: भारत में डायबिटीज कोई साधारण बीमारी नहीं अब महामारी का रूप ले चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की बात कर लें तो यहां 10 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और 2030 तक यह संख्या 13.5 करोड़ तक पहुंच सकती है. डायबिटीज के निदान और नियंत्रण के लिए एचबीए1सी टेस्ट को अब तक ‘सोने का मानक’ माना जाता रहा है. यह पिछले 2-3 महीनों की औसत ब्लड शुगर को मापता है और आसान, गैर-आक्रामक तथा विश्वसनीय लगता है.
लेकिन फरवरी 2026 में ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया’ जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस धारणा को गहरा झटका दिया है. प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकृतियां और अन्य कारकों के कारण एचबीए1सी टेस्ट गलत निदान कर सकता है, जिससे डायबिटीज का पता 4 साल तक देरी से चल सकता है.
भारत में एनीमिया की समस्या भी बेहद गंभीर है. NFHS-5 के अनुसार, 50% से ज्यादा वयस्क महिलाएं और 25% पुरुष एनीमिया से प्रभावित हैं. एनीमिया आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या घटाता है, जिससे एचबीए1सी का स्तर कृत्रिम रूप से ऊंचा दिखता है. नतीजा यह होता है कि बिना डायबिटीज वाले व्यक्ति को गलत तरीके से डायबिटीज का मरीज घोषित कर दिया जाता है.
इसके उलट थैलेसीमिया या जी6पीडी की कमी HbA1c को कम दिखा सकती है, जिससे वास्तविक डायबिटीज वाले मरीजों का निदान देरी से होता है. अध्ययन के अनुसार दक्षिण एशियाई लोगों में एचबीए1सी और वास्तविक ब्लड ग्लूकोज के बीच सहसंबंध कमजोर है. एनीमिया वाले क्षेत्रों में एचबीए1सी पर निर्भरता से 20-30% मामलों में गलत निदान हो सकता है.
यह अध्ययन बताता है कि भारत जैसे विकासशील देशों में जहां एनीमिया और आनुवंशिक विकार आम हैं, HbA1c को अकेले इस्तेमाल करना जोखिमपूर्ण है. यह पश्चिमी आबादी पर आधारित मानकों को सीधे लागू करने की भूल को उजागर करता है. भारतीयों में ‘थ्रिफ्टी जीन’ हाइपोथेसिस पहले से ही इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है, लेकिन HbA1c की सीमाएं जानकर हम बेहतर रणनीति बना सकते हैं. अगर इसे नजरअंदाज किया गया तो ‘साइलेंट किलर’ डायबिटीज और घातक हो जाएगी. अनावश्यक दवाएं या देरी से उपचार से हृदय रोग, किडनी फेलियर जैसी जटिलताएं बढ़ सकती हैं.
फार्मा उद्योग, जो डायबिटीज मार्केट से अरबों-खरबों कमाता है, इस अध्ययन से हलचल में आ सकता है. भारत में HbA1c टेस्ट किट्स का बाजार 500 करोड़ से ज्यादा का है. इस अध्ययन से बड़ी कंपनियों की बिक्री प्रभावित हो सकती है. भारतीय डॉक्टर इस अध्ययन से सहमत हैं लेकिन घबराहट की बजाय सतर्कता की वकालत करते हैं. प्रोफेसर अनूप मिश्रा कहते हैं कि एचबीए1सी पर पूर्ण निर्भरता से गलत वर्गीकरण हो सकता है. एंडोक्राइन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सर्वे में 70% डॉक्टरों ने कहा कि एनीमिया वाले मरीजों में ओजीटीटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. HbA1cउपयोगी है, लेकिन अकेला नहीं. मिलीजुली प्रक्रिया से ही सटीक निदान संभव है.
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-भारत एक्सप्रेस
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