Categories: बिजनेस

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से बदल सकती है भारत की ‘इनोवेशन इकॉनमी’ की रफ्तार

Digital Economy 2.0: एक दशक पहले तक सरकारी सब्सिडी, सेवाओं के भुगतान और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए लंबी कतारें, भारी कागजी काम और लीकेज जैसी समस्याएं आम थीं. लेकिन आज डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) ने इन प्रक्रियाओं को एक क्लिक में तेज़, सुरक्षित और पारदर्शी बना दिया है.

यूपीआई (UPI) की ओपन प्रोटोकॉल व्यवस्था और इंटरऑपरेबल एपीआई सिस्टम ने न केवल लेन-देन की लागत घटाई है, बल्कि देश में वित्तीय समावेशन को भी अभूतपूर्व गति दी है. आधार (Aadhaar) स्टैक ने जहां कल्याण योजनाओं की पारदर्शिता सुनिश्चित की, वहीं अब यह समय है कि इसी ‘स्टैक लॉजिक’ को भारत की ज्ञान और नवाचार प्रणाली में लागू किया जाए.

भारत का ‘इनोवेशन डेफिसिट’

आज नवाचार (Innovation) न केवल आर्थिक वृद्धि का इंजन है बल्कि राष्ट्रीय शक्ति की बुनियाद भी बन चुका है. फिर भी, भारत एक गंभीर ‘ट्विन डेफिसिट’ से जूझ रहा है विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में उसकी वैश्विक हिस्सेदारी बहुत सीमित है. विश्व के शीर्ष 1% वैज्ञानिक प्रकाशनों में भारत का योगदान मुश्किल से 1% से थोड़ा ऊपर है, जबकि अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च पहले ही जीडीपी का 0.5% पार कर चुका है.

सबसे बड़ी बाधा यह है कि भारत में अभी तक कोई ऐसा इंटरऑपरेबल सिस्टम नहीं है जो रिसर्च इनपुट्स — जैसे कार्यक्रम, ग्रांट्स, बजट आवंटन — को आउटपुट्स यानी प्रकाशन, पेटेंट या तकनीकी नवाचार से व्यवस्थित रूप से जोड़े. परिणामस्वरूप, न तो प्रदर्शन का ठोस मूल्यांकन संभव है और न ही नीतियों में त्वरित सुधार.

फाउंडेशन फॉर एडवांसिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी (FAST) के ‘Ease of Doing Research’ सर्वे के मुताबिक, शोधकर्ताओं को सबसे बड़ी कठिनाई प्रयोगों की डिजाइनिंग में नहीं, बल्कि वित्तीय प्रक्रिया में आती है.

मुख्य कारण है जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) 2017, जिसके कठोर प्रावधान अनुसंधान की गतिशील और समय-संवेदनशील प्रकृति के साथ मेल नहीं खाते. हाल के संशोधनों से उपकरण खरीद में कुछ लचीलापन जरूर आया है, परंतु समस्याएं अब भी बनी हुई हैं — जैसे फंड जारी होने में देरी, लंबी खरीद प्रक्रियाएं और मंजूरी के बिखरे हुए रास्ते, जो शोध की रफ्तार को धीमा कर देते हैं.

DPI: रिसर्च में पारदर्शिता और दक्षता लाने का सही औजार

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर इस जटिलता को खत्म करने में सबसे प्रभावी साधन साबित हो सकता है. इसके तीन बड़े कारण हैं —

विखंडित और विवेकाधीन दिशा-निर्देश

देश की नवाचार प्रणाली कई नियमों और मंत्रालय-विशिष्ट गाइडलाइनों से संचालित होती है. लेकिन ये नियम स्पष्ट, कोडिफाइड या डिजिटल रूप से एन्कोड नहीं हैं. नतीजा यह कि हर संस्था अपने हिसाब से इन्हें लागू करती है.

जटिल और बहु-स्तरीय प्रक्रियाएं

फंड जुटाने से लेकर उपयोग और रिपोर्टिंग तक की प्रक्रिया कई एजेंसियों, विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं में बंटी हुई है. अनुमान के मुताबिक, इन लेन-देन का कुल मूल्य जीडीपी के करीब 0.75% तक है, पर दक्षता बेहद कम है.

निवेश पर रिटर्न का अभाव

12 से अधिक केंद्रीय मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच कोई साझा टैक्सोनॉमी नहीं होने से ग्रांट्स और उनके परिणामों की एकरूपता नहीं बन पाती. इससे निवेश का सही मूल्यांकन असंभव हो जाता है.

‘इनोवेशन स्टैक’ भविष्य का रास्ता

भारत को अब एक Innovation Stack तैयार करना होगा — ऐसा डिजिटल ढांचा जो अनुसंधान और नवाचार से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को एल्गोरिदमिक और इंटरऑपरेबल बना सके.

इसकी तीन मुख्य परतें होंगी

Standards: ग्रांट्स, पीयर-रिव्यू, डिस्बर्समेंट, प्रोक्योरमेंट और रिपोर्टिंग को मशीन-रीडेबल स्कीमा में परिभाषित करना, ताकि विभिन्न एजेंसियों के डेटा को एक साथ एकीकृत किया जा सके.

Integration: इन मानकों को विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं के मौजूदा ERP, रजिस्ट्रियों और वित्तीय प्रणालियों से API के ज़रिए जोड़ना.

Infrastructure: यह पूरा सिस्टम इंडिया स्टैक पर आधारित होगा — आधार (पहचान के लिए), डिजिलॉकर (दस्तावेजों के लिए), गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) (खरीद के लिए) और अकाउंट एग्रीगेटर (वित्तीय प्रवाह के लिए).

कैसे बदलेगा सिस्टम

आज किसी ग्रांट के लिए आवेदन करना या फंड प्रबंधन करना, शोधकर्ताओं के लिए एक थकाऊ प्रक्रिया है — पीडीएफ खंगालना, अलग-अलग पोर्टल्स पर डेटा भरना और मंजूरी के लिए हफ्तों इंतजार करना. वहीं नीति-निर्माताओं के पास यह जानने के उपकरण नहीं हैं कि किसी विशेष क्षेत्र जैसे ड्रोन या एआई में कितना निवेश हो रहा है.

अगर ग्रांट्स को डिजिटल ऑब्जेक्ट्स के रूप में परिभाषित किया जाए, जिनमें उद्देश्य, पात्रता, मूल्यांकन प्रक्रिया, समयसीमा और परिणाम का मानकीकृत डेटा हो, तो पूरा सिस्टम अपने आप सुगम हो जाएगा. एजेंसियां अपने फ्रंट-एंड बनाए रखते हुए साझा API पर काम कर सकेंगी.

शोधकर्ताओं और सरकार  दोनों के लिए फायदे

  • आवेदन प्रक्रिया ऑटो-फिल और साझा टैक्सोनॉमी के ज़रिए आसान होगी.
  • पीयर रिव्यू में पारदर्शिता और ट्रेसबिलिटी आएगी.
  • अकाउंट एग्रीगेटर सिस्टम से फंड प्रवाह तेज़ और उपयोग प्रमाणपत्र स्वतः तैयार होंगे.
  • रिसर्च-विशिष्ट GeM कैटलॉग से उपकरण खरीद आसान होगी.
  • फेडरेटेड रजिस्ट्रियों से सहयोग और नीति-संरेखण बेहतर होगा.
  • रियल-टाइम डैशबोर्ड से मंजूरी की स्थिति, औसत प्रोसेसिंग समय और बॉटलनेक्स पर नज़र रखी जा सकेगी.

ये भी पढ़ें: GST Cuts के कारण नवरात्रि में बिक्री 10 साल के उच्चतम स्तर पर; रिटेलर्स ने दर्ज की 25 से 100% की वृद्धि

-भारत एक्सप्रेस 

निहारिका गुप्ता

Recent Posts

बाबू जगजीवन राम: देश के इकलौते रक्षा मंत्री, जिनकी रणनीति से कांप उठा था पाकिस्तान

1971 के युद्ध में बांग्लादेश निर्माण के सूत्रधार और देश को अन्न संकट से उबारने…

6 hours ago

तिरुवनंतपुरम में ‘किंग कोहली’ का तूफान! शतक ठोक वेस्टइंडीज को उधेड़ा, भारत ने 8 विकेट से रौंदा

Virat Kohli Century: भारत ने विराट कोहली और कप्तान शुभमन गिल की शतकीय पारियों के…

7 hours ago

एक भाषा या ग्रंथ तक सीमित नहीं है भारतीय ज्ञान परंपरा: शंभुनाथ की पुस्तक में उजागर हुई सभ्यता की बहुरंगी अंतर्दृष्टि

शंभुनाथ की पुस्तक 'भारतीय ज्ञान परंपरा: एक सभ्यता की अंतर्दृष्टि' के आलोक में जानिए कि…

7 hours ago

जयपुर में प्रेग्नेंट लिव-इन पार्टनर की हत्या कर गार्डन में दफनाई लाश, ऊपर से डाला नमक, आरोपी फरार

Crime News: जयपुर के बिंदायका की प्रेस्टीज कॉलोनी में लिव-इन पार्टनर प्रवेश ने किरन नाम…

7 hours ago

अमित शाह की कांग्रेस को सीधी ललकार! बोले- बेतुके दावों की जगह आंकड़ों के साथ करें चर्चा

Amit Shah: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कांग्रेस पर अपना हमला तेज…

8 hours ago

मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देकर पॉक्सो से नहीं बच सकते: नाबालिग पत्नी से संबंध पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग पत्नी से…

8 hours ago