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नॉन-रीसाइक्लेबल प्लास्टिक से बन रही ग्रीन ब्रिक्स, Gen-Z के युवा उद्यमियों ने खोजा कचरे से कमाई का नया रास्ता

प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए युवा उद्यमियों की एक नई पीढ़ी इसे सिर्फ सफाई की चुनौती नहीं, बल्कि एक उपयोगी कच्चे माल के रूप में देख रही है. इन युवाओं का फोकस ऐसे प्लास्टिक पर है, जिसे आमतौर पर रिसाइकिल करना मुश्किल होता है. माइक्रो-फैक्ट्री मॉडल के जरिए इस कचरे को इकट्ठा किया जाता है, फिर उसे प्रोसेस करके मजबूत निर्माण सामग्री यानी ग्रीन ब्रिक्स में बदलने की कोशिश की जाती है.

इस मॉडल की खासियत यह है कि प्लास्टिक को दूर-दराज के बड़े कारखानों तक ले जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही उसका इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे कचरे का प्रबंधन बेहतर बनाने, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. हालांकि, प्लास्टिक से बनी ईंटें प्रदूषण की पूरी समस्या का समाधान नहीं हैं, लेकिन वे ऐसे कचरे के इस्तेमाल का एक व्यावहारिक विकल्प जरूर पेश करती हैं, जिसे पारंपरिक रिसाइक्लिंग व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज कर देती है.

नॉन-रीसाइक्लेबल प्लास्टिक का प्रबंधन मुश्किल क्यों ?

नॉन-रीसाइक्लेबल प्लास्टिक यानी ऐसा प्लास्टिक जिसे सामान्य तरीकों से रिसाइकिल करना मुश्किल होता है. इसकी वजह यह है कि कई बार प्लास्टिक के अलग-अलग प्रकार आपस में मिले होते हैं. कुछ प्लास्टिक पर खाने-पीने की चीजों के अवशेष या दूसरी गंदगी लगी होती है, जबकि कुछ बेहद पतले, लचीले या कई परतों से बने होते हैं. इनके बाजार में कम दाम मिलने के कारण भी इन्हें रिसाइकिल करना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रहता.

चिप्स और बिस्कुट के रैपर, छोटे पाउच, प्लास्टिक की पतली फिल्म, बोतलों के ढक्कन और अलग-अलग तरह के प्लास्टिक के टुकड़े इसके उदाहरण हैं. इनमें दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले पॉलिमर मौजूद हो सकते हैं, लेकिन इन्हें अलग करना, साफ करना, पिघलाना और फिर बाजार में बेचना आसान नहीं होता.

यही वजह है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या सिर्फ उसे इकट्ठा करने तक सीमित नहीं है. कई जगहों पर प्लास्टिक की बोतलें और दूसरे ठोस प्लास्टिक उत्पाद तो इकट्ठा कर लिए जाते हैं, लेकिन हल्का, गंदा और मिला-जुला प्लास्टिक पीछे छूट जाता है. आखिरकार ऐसा कचरा लैंडफिल में पहुंचता है, खुले में जला दिया जाता है या नालों, नदियों और दूसरी जलधाराओं में बह जाता है.

नॉन-रीसाइक्लेबल प्लास्टिक को रिसाइकिल करने की कोशिश इसी समस्या का समाधान तलाशती है. इसका उद्देश्य हर तरह के प्लास्टिक को दोबारा पैकेजिंग में बदलना नहीं, बल्कि उपयुक्त प्लास्टिक कचरे के लिए सुरक्षित और उपयोगी विकल्प खोजना है.

ग्रीन ब्रिक्स इसी दिशा में एक संभावित विकल्प हैं. माइक्रो-फैक्ट्रियों में प्लास्टिक कचरे को गर्म करने, दबाव देने, सांचे में ढालने या दूसरी बाइंडिंग तकनीकों की मदद से निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है. हालांकि, ऐसी ईंटों को पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बताने से पहले उनकी मजबूती, आग के प्रति व्यवहार, मौसम का असर झेलने की क्षमता और सुरक्षित इस्तेमाल की जांच जरूरी है.

माइक्रो-फैक्ट्री मॉडल: स्थानीय कचरे से स्थानीय स्तर पर उत्पादन

माइक्रो-फैक्ट्री ऐसी छोटी उत्पादन इकाई होती है, जहां कचरे को उसी इलाके के आसपास प्रोसेस किया जाता है, जहां वह पैदा होता है. पारंपरिक व्यवस्था में प्लास्टिक को इकट्ठा करके दूर स्थित बड़े कारखानों तक भेजना पड़ सकता है. इसके उलट, माइक्रो-फैक्ट्री में स्थानीय टीम प्लास्टिक को इकट्ठा करने, छांटने, छोटे टुकड़ों में काटने, गर्म करने, सांचे में ढालने और ठंडा करने जैसे काम एक छोटी जगह पर कर सकती है.

इस मॉडल से कचरे के प्रबंधन को स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तैयार करना आसान हो सकता है. साथ ही, इससे समुदाय की भागीदारी बढ़ाने और लोगों को यह समझाने में भी मदद मिल सकती है कि उनके घरों और बाजारों से निकलने वाला प्लास्टिक आखिर कहां जाता है और उसका इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है.

अगर इस प्रक्रिया को सही तरीके से चलाया जाए, तो स्थानीय निकायों, कचरा इकट्ठा करने वाले लोगों और छोटे उद्यमियों के बीच सहयोग की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं. हालांकि, इसके लिए सही मशीनों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, सुरक्षित उत्पादन प्रक्रिया और कचरे की नियमित उपलब्धता की जरूरत होगी.

प्लास्टिक प्रदूषण के समाधान की ओर Gen-Z के युवा क्यों बढ़ रहे हैं?

Gen-Z के युवा ऐसे दौर में बड़े हुए हैं, जब जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं. सोशल मीडिया के जरिए भी उन्हें कचरे से जुड़ी समस्याओं और उनके संभावित समाधानों के बारे में जानकारी मिलती रहती है. ऐसे में कई युवा केवल पर्यावरण संरक्षण की बात करने के बजाय जमीन पर कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिसका असर साफ दिखाई दे.

प्लास्टिक कचरे से ईंटें बनाने का विचार इसी सोच से जुड़ा है. इसमें एक ऐसी समस्या को उपयोगी उत्पाद में बदलने की कोशिश की जाती है, जिसे लोग रोजाना अपने आसपास देखते हैं. इससे पर्यावरण संरक्षण को आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ना भी आसान हो जाता है.

इन युवा उद्यमियों के लिए प्लास्टिक ब्रिक्स का कारोबार केवल एक उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए कचरा संग्रह, लोगों को जागरूक करने, नए डिजाइन तैयार करने, स्थानीय रोजगार पैदा करने और सर्कुलर इकोनॉमी यानी ऐसी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की संभावनाएं बन सकती हैं, जिसमें संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा समय तक किया जाता है.

इस पूरी प्रक्रिया में माइक्रो-फैक्ट्री की भी अहम भूमिका है. यहां एक तरफ बेकार समझा जाने वाला प्लास्टिक पहुंचता है और दूसरी तरफ उससे तैयार उत्पाद निकलता है. यह मॉडल लोगों को कचरे के सही प्रबंधन का महत्व समझाने का एक माध्यम भी बन सकता है.

उदाहरण के लिए, अगर किसी इलाके के लोग अपने यहां इकट्ठा किए गए प्लास्टिक से बनी बेंच, पेवर ब्लॉक या किसी अन्य उपयोगी उत्पाद को देखते हैं, तो उन्हें कचरा कम करने की कोशिश का सीधा नतीजा दिखाई देता है. इससे लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है.

हालांकि, इस तरह की पहल को सफल बनाने के लिए केवल अच्छी कहानी या आकर्षक प्रचार काफी नहीं है. प्लास्टिक से बने उत्पादों की गुणवत्ता की जांच, कच्चे माल के स्रोत की पारदर्शिता और सुरक्षित उत्पादन प्रक्रिया पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है.

पर्यावरण को कितना फायदा?

प्लास्टिक से बनी ईंटों का पर्यावरण पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस चीज की जगह इस्तेमाल की जा रही हैं, उन्हें बनाने में कितनी ऊर्जा लगती है, वे कितने समय तक टिकती हैं और इस्तेमाल के बाद उनका क्या किया जाता है.

अगर इन ईंटों के इस्तेमाल से ऐसा प्लास्टिक कचरा खुले में फेंके जाने, जलाए जाने या लैंडफिल में जाने से बचता है और तैयार उत्पाद लंबे समय तक उपयोगी बना रहता है, तो इससे पर्यावरण को फायदा मिल सकता है. लेकिन अगर खराब गुणवत्ता के कारण ईंटें जल्दी टूट जाएं या इस्तेमाल के बाद उनका दोबारा उपयोग और सुरक्षित निपटान संभव न हो, तो समस्या सिर्फ कुछ समय के लिए टलेगी.

प्लास्टिक से ईंट बनाने का प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए क्या जरूरी है?

प्लास्टिक कचरे से उपयोगी निर्माण सामग्री बनाने की दिशा में काम करने वाले युवाओं को शुरुआत में सीमित लक्ष्य रखना चाहिए. सबसे पहले किसी एक ऐसे उत्पाद पर काम करना बेहतर होगा, जिसकी गुणवत्ता को आसानी से जांचा जा सके और जिसके लिए स्थानीय स्तर पर वास्तविक जरूरत मौजूद हो.

इसके लिए सबसे पहले यह तय करना जरूरी है कि किस तरह का प्लास्टिक इस्तेमाल किया जा सकता है और किन सामग्रियों को प्रक्रिया से बाहर रखना होगा. कचरे में मौजूद गंदगी और दूसरे पदार्थों को अलग करने की व्यवस्था भी बनानी होगी. ऐसा करने से माइक्रो-फैक्ट्री में हर तरह का कचरा इकट्ठा होने और उसे सुरक्षित तरीके से प्रोसेस न कर पाने का जोखिम कम होगा.

इसके अलावा, प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए.

– स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्लास्टिक कचरे के स्रोतों की पहचान करें और उसकी नियमित उपलब्धता का आकलन करें.
– संभव हो तो इंजीनियरों, सामग्री विशेषज्ञों और निर्माण क्षेत्र के पेशेवरों से सलाह लें.
– रिसाइक्लिंग, उत्पादन, प्रदूषण नियंत्रण और निर्माण सामग्री के इस्तेमाल से जुड़े स्थानीय नियमों की जानकारी जुटाएं.
– शुरुआत में सीमित और कम जोखिम वाले उपयोगों के लिए नमूने तैयार करें.
– उत्पाद की मजबूती, आग के प्रति व्यवहार, पानी के असर और टिकाऊपन की जांच कराएं.
– प्लास्टिक को काटने, गर्म करने और संभालने के दौरान कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए जरूरी इंतजाम करें.
– उत्पाद पर उसके इस्तेमाल, सीमाओं और उपयुक्त परिस्थितियों की स्पष्ट जानकारी दें.
– उत्पादन बढ़ाने से पहले उत्पाद को वापस लेने, उसकी मरम्मत करने या दोबारा प्रोसेस करने की व्यवस्था तैयार करें.

यहां सबसे अहम बात यह है कि पर्यावरण बचाने की अच्छी मंशा अपने आप किसी प्रोजेक्ट को सफल या सुरक्षित नहीं बना देती. एक वास्तविक प्लास्टिक प्रदूषण समाधान और कुछ समय बाद बंद हो जाने वाली पर्यावरणीय पहल के बीच अंतर उत्पादन की गुणवत्ता, सुरक्षा और सही प्रबंधन से तय होता है.

प्लास्टिक कचरा कम करने में समुदाय कैसे निभा सकता है भूमिका?

प्लास्टिक से ईंट बनाने वाले प्रोजेक्ट तभी बेहतर परिणाम दे सकते हैं, जब समुदाय, स्थानीय प्रशासन और कारोबार भी इसमें सहयोग करें. लोगों को कचरा अलग-अलग करके देने, जांचे-परखे उत्पादों को प्राथमिकता देने और प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है.

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि प्लास्टिक ब्रिक्स का इस्तेमाल कचरा रोकने के दूसरे उपायों का विकल्प नहीं बन सकता. प्लास्टिक की खपत कम करना, चीजों का दोबारा इस्तेमाल करना, रिफिल सिस्टम को बढ़ावा देना और जरूरत से ज्यादा पैकेजिंग से बचना अब भी सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं.

घरों और कारोबारों के स्तर पर सबसे पहले अनावश्यक प्लास्टिक का इस्तेमाल कम किया जा सकता है. इसके बाद कचरे को सही तरीके से अलग करना जरूरी है, ताकि उपयोगी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल या रिसाइकिल करने की संभावना बढ़े. इसके साथ ही ऐसे स्थानीय उद्यमियों को समर्थन दिया जा सकता है, जो पारदर्शी तरीके से बताते हैं कि वे किस तरह का कचरा इकट्ठा करते हैं, उससे क्या बनाते हैं और तैयार उत्पाद का इस्तेमाल कहां होता है.

समुदाय के स्तर पर कचरा संग्रह अभियान चलाना, प्लास्टिक को सूखा और अलग-अलग रखना, स्कूलों में पर्यावरण से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करना और दुकानदारों व कंपनियों से पैकेजिंग कम करने की मांग करना उपयोगी कदम हो सकते हैं.

वहीं, नगर निकाय स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कचरे से जुड़ा डेटा साझा करके, सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराने में मदद करके, प्रायोगिक परियोजनाओं के लिए जगह तय करके और मंजूरी की प्रक्रिया स्पष्ट बनाकर ऐसे उद्यमों को प्रोत्साहित कर सकते हैं.

भविष्य की राह: स्थानीय उत्पादन, सुरक्षित तकनीक और सर्कुलर इकोनॉमी

ग्रीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी संभावना यह नहीं है कि इनके जरिए प्लास्टिक कचरा पूरी तरह खत्म हो जाएगा. असल बात यह है कि ये दिखाती हैं कि सही तकनीक, बेहतर डिजाइन और जिम्मेदार रिसाइक्लिंग के जरिए मुश्किल से संभाले जाने वाले कचरे को किसी उपयोगी उत्पाद में बदला जा सकता है.

Gen-Z के युवा उद्यमियों के लिए यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण और कारोबार को एक साथ जोड़ने का अवसर पेश करता है. स्थानीय स्तर पर कचरे का संग्रह, छोटी उत्पादन इकाइयां और जरूरत के मुताबिक तैयार उत्पाद इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं.

हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तैयार सामग्री कितनी सुरक्षित है, उसकी गुणवत्ता कितनी भरोसेमंद है और इस्तेमाल के बाद उसके निपटान की क्या व्यवस्था है. प्लास्टिक से ईंटें बनाने की पहल को तभी वास्तविक पर्यावरणीय समाधान माना जा सकता है, जब वह प्लास्टिक की खपत कम करने और दूसरे बेहतर विकल्पों को बढ़ावा देने के साथ-साथ कचरे के सुरक्षित प्रबंधन में भी योगदान दे.

आखिरकार, कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की कोशिश तभी सार्थक होगी, जब उससे पैदा होने वाले पर्यावरणीय लाभ वास्तविक हों और नई समस्याएं पैदा किए बिना लंबे समय तक बने रहें.

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-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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