मनोरंजन

‘इसमें बस इतनी जिंदगी बाकी छोड़ देना की ये मौत अपनी आंखो से देख सके’, आज भी डायलॉग में जिंदा हैं Amjad Khan

Amjad Khan Death Anniversary: ‘अरे ओ सांभा… कितने आदमी थे?’ ये एक संवाद नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुका एक लम्हा है. इस संवाद के साथ पर्दे पर जो चेहरा उभरा, उसने न केवल खौफ पैदा किया बल्कि एक ऐसे कलाकार को जन्म दिया, जिसकी अभिनय की गहराइयों को आज भी सिनेमा प्रेमी याद करते हैं. उस कलाकार का नाम है (Amjad Khan) अमजद खान.

12 नवंबर 1940 को जन्मे अमजद खान, 27 जुलाई 1992 को विदा हो गए, लेकिन उनका अभिनय, उनकी आवाज, उनके संवाद और उनका व्यक्तित्व आज भी जिंदा है, हर उस दर्शक के दिल में, जिसने कभी ‘शोले’ देखी है या ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘याराना’, ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्में.

फिल्मी दुनिया में खलनायक के किरदार को जो गहराई अमजद खान (Amjad Khan) ने दी, वो पहले किसी ने नहीं दी थी. उनके पिता जयंत खुद एक प्रतिष्ठित अभिनेता थे. अमजद खान ने अभिनय की बारीकियों को घर में ही सीखा. बतौर बाल कलाकार उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे रंगमंच से लेकर फिल्मी दुनिया तक, अपने किरदारों में ढलते चले गए.

1975 में आई रेमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह के किरदार ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया. दिलचस्प बात यह है कि इस किरदार के लिए उन्होंने ‘अभिशप्त चंबल’ नामक किताब पढ़ी थी ताकि वह असली डकैतों की मानसिकता को समझ सकें. गब्बर सिंह के रूप में वह भारतीय सिनेमा के पहले ऐसे विलेन बने, जिसने बुराई को ग्लैमर और शैली दी. एक ऐसा किरदार, जो खुद को बुरा मानता है और उस पर गर्व भी करता है.

डायलॉग जो आज भी लोगों के ज़ुबां पर हैं

‘शोले’ में उनके संवाद ‘कितने आदमी थे?’, ‘जो डर गया समझो मर गया’, ‘इसमें बस इतनी जिंदगी बाकी छोड़ देना की ये मौत अपनी आंखो से देख सके’और ‘तेरा क्या होगा कालिया’ जैसे डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर हैं. गब्बर सिंह का किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि अमजद खान को बिस्किट जैसे प्रोडक्ट के विज्ञापन में भी उसी रूप में दिखाया गया. यह पहली बार था जब किसी विलेन को ब्रांड एंडोर्समेंट के लिए इस्तेमाल किया गया.

अमजद खान केवल ‘गब्बर’ नहीं थे. उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने दर्शकों को गंभीर, हास्य और सकारात्मक भूमिकाओं में भी प्रभावित किया. सत्यजित रे की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी (1977) में नवाब वाजिद अली शाह की भूमिका में उनका शाही ठहराव और सूक्ष्म अभिनय भारतीय कला सिनेमा के लिए एक अमूल्य योगदान था. वहीं, ‘मीरा’ (1979) में उन्होंने अकबर की भूमिका को जिस गरिमा से निभाया, वह ऐतिहासिक पात्रों के चित्रण में एक मानक बन गया.

ये भी पढ़ें: Ekta Kapoor का ALTT ऐप से नहीं कोई लेना-देना, सरकार के बैन लगाने पर तोड़ी चुप्पी

जब-जब विलेन की गुंज से थर्राया सिनेमा

‘याराना’ और ‘लावारिस’ जैसी फिल्मों में उन्होंने सकारात्मक किरदार निभाए, जबकि ‘उत्सव’ (1984) में वात्स्यायन के किरदार ने उनके अभिनय की बौद्धिक गहराई को उजागर किया. उनके हास्य अभिनय की मिसाल ‘कुर्बानी’, ‘लव स्टोरी’ और ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्मों में मिलती है, जहां उन्होंने दर्शकों को हंसी के साथ-साथ अपनी अदाकारी से हैरान किया.

परदे से बाहर अमजद खान एक बुद्धिमान, संवेदनशील और सामाजिक रूप से सजग व्यक्ति थे. कॉलेज के दिनों से ही वह नेतृत्वकारी व्यक्तित्व रहे और बाद में ‘एक्टर गिल्ड’ के अध्यक्ष के तौर पर कलाकारों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे. कई बार उन्होंने कलाकारों और निर्माताओं के बीच मध्यस्थता कर समाधान निकाले. एक ऐसा पहलू जो शायद आम दर्शक के सामने नहीं आता, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें अपार सम्मान दिलाता था.

वह एक समर्पित पारिवारिक व्यक्ति थे. उन्होंने 1972 में शायला खान से विवाह किया, जो प्रख्यात लेखक अख्तर उल इमान की बेटी थीं. उनके तीन संतानें, शादाब, अहलम और सिमाब हैं. शादाब खान ने भी पिता की राह पर चलने की कोशिश की, लेकिन अमजद खान जैसी छवि बना पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं था.

भारतीय सिनेमा के अमर नायक-खलनायक

1980 के दशक में उन्होंने ‘चोर पुलिस’ और ‘अमीर आदमी गरीब आदमी’ जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया, लेकिन निर्देशन में उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली जैसी अभिनय में. 1976 में एक गंभीर सड़क दुर्घटना के बाद उनकी सेहत प्रभावित हुई.

उन्हें दिए गए स्टेरॉयड के कारण उनका वजन बढ़ता गया, जो उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हुआ. अंततः 1992 में 27 जुलाई को हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया. उनकी अंतिम यात्रा में बॉलीवुड के तमाम दिग्गज शामिल हुए. उनकी शवयात्रा जब बांद्रा की गलियों से निकली, तो मानो पूरा हिंदी सिनेमा उनके सम्मान में सिर झुकाए खड़ा था.

आज के दौर में अमजद खान सिर्फ एक अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक युग के रूप में प्रतीत होते हैं—एक ऐसा युग जिसने विलेन को भी वही शोहरत दी जो हीरो को मिलती है. एक ऐसा अभिनेता जिसने स्क्रीन पर अपने भारी कद-काठी और गहरी आवाज से लोगों को डराया भी, हंसाया भी और सोचने पर मजबूर भी किया.

अमजद खान अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संवाद, उनकी छवि और उनका अभिनय हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए हैं. भारतीय सिनेमा के सबसे महान खलनायकों में से एक होने के साथ-साथ, वह एक संवेदनशील अभिनेता, जिम्मेदार नेता और एक बेहतरीन इंसान थे.

-भारत एक्सप्रेस 

निहारिका गुप्ता

Recent Posts

शराब की दुकान में घुसी बंदरिया, पूरी बोतल पीकर हुई बेसुध; फिर मचाया जमकर उत्पात

Ranchi Monkey Viral News: रांची के ओरमांझी में एक बंदरिया शराब की दुकान में घुस…

21 minutes ago

केदारनाथ में 5 महीने में 50.30 टन कचरा, पिछले तीन साल का रिकॉर्ड टूटा

Kedarnath Waste Crisis 2026: केदारनाथ में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 50.30 मीट्रिक टन…

41 minutes ago

नागालैंड में जहरीली शराब का तांडव, 2 दिन में 19 लोगों की दर्दनाक मौत

Nagaland Spurious Liquor Deaths: साल 1990 से पूर्ण शराबबंदी वाले राज्य नागालैंड में मिलावटी और…

43 minutes ago

पितृ दोष से पाना चाहते हैं हमेशा के लिए मुक्ति? 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर कर लें यह अचूक उपाय

Kab Hai Sarva Pitru Amavasya: पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है.वर्ष…

47 minutes ago

Manmohan Singh Birth Anniversary: पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री को किया याद, आर्थिक सुधारों को दी श्रद्धांजलि

Manmohan Singh Birth Anniversary Tributes: पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र…

1 hour ago