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पेपर लीक से शुरू हुआ करियर…पेपर लीक पर इस्तीफा; धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक सफर की पूरी कहानी

Dharmendra Pradhan Resigns: कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है. जो धर्मेंद्र प्रधान खुद पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर और पुलिस की लाठी खाकर अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. उसी धर्मेंद्र प्रधान को आज NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के आंदोलन के चलते अपना शिक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा. उन्होंने साल 1997 में ओडिशा में हुए पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन किया था. उस समय वहां जेबी पटनायक की सरकार थी.

NEET पेपर लीक के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले छात्र पूरे देश में आंदोलन कर रहे हैं. नई दिल्ली जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन जंगल में लगी आग की तरह पूरे देश में फैल गया. जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले तक इस्तेमाल किये. पुलिस की इस कार्रवाई में कई छात्रों को चोटे आई हैं.

पिछले एक महीने से आंदोलन कर रहे छात्रों की प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी शामिल था. छात्रों का कहना था कि धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में पेपर लीक की घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं, इसलिए उन्हें अपना पद छोड़ देना चाहिये और आज धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नोट शेयर किया है, जिसमें उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया है.

कैसे शुरू हुआ प्रधान का करियर?

धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक करियर 80 के दशक से ही शुरू हो गया था. वे बचपन से ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े हुए थे. बाद में वो तालचेर कॉलेज छात्र संगठन के अध्यक्ष चुने गए. हालांकि बाद के सालों में उत्कल यूनिवर्सिटी छात्र संगठन के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में एसएफआई के उम्मदवार अरुण साहू से हार गए थे.

ऐसे चढ़ी राजनीतिक सीढ़ियां

साल था 1997. इस दशक को पेपर लीक का दशक कहा जाता है, क्योंकि उस समय बहुत सारी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे. इस दौरान उड़िसा में बीजद की सरकार थी और जेबी पटनायक सीएम थे. तभी अखबारों में हेडलाइन छपती है कि प्लस टू (12वीं) का पेपर लीक हो गया है. उन दिनों धर्मेंद्र प्रधान एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव थे. उन्होंने पेपर लीक को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ हल्लाबोल कर दिया.

धर्मेंद्र प्रधान विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को लेकर पेपर लीक के खिलाफ ओडिशा विधानसभा के सामने प्रदर्शन करने लगे. जैसे-जैसे समय बीत रहा था प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती जा रही थी. प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए राज्य सरकार ने रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों को काम पर लगा दिया. आएएफ के जवानों ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर जमकर लाठियां बरसाई. इस लाठीचार्ज में धर्मेंद्र प्रधान सहित कुल 64 एबीवीपी के कार्यकर्ता घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

छात्रसंघ से केंद्रीय मंत्री तक का सफर

उत्कल विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद पर हार के बाद भी प्रधान का राजनैतिक उत्थान जारी रहा. वो अपने मेहनत और लगन से लगातार राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते रहे. साल 1994 से 1997 तक वो एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव बने रहे. इसके बाद साल 2004 से उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद वो बीजेपी के भी राष्ट्रीय महासचिव बने.

धर्मेंद्र प्रधान का चुनावी करियर साल 2000 के ओडिशा विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ था. उन्होंने पाललहड़ा से अपनी पहली मेन स्ट्रीम राजनीतिक जीत दर्ज की थी. इसके बाद वो साल 2004 के लोकसभा चुनाव में देवगढ़ सीट से सांसद बने.

हालांकि इसके बाद उन्हें संगठन में भेज दिया गया, जिसकी वजह से वो लंबे समय तक चुनाव से दूर रहे. साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीत दर्ज की, तब एक बार फिर वो सार्वजनिक रूप से राजनीति में एक्टिव हो गए. 2014 में उन्हें पेट्रोलियम राज्य मंत्री बनाया गया. उस समय वो बिहार से राज्यसभा सांसद थे. इसके बाद वो साल 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर ओडिशा पहुंचे और संबलपुर से सांसद बने.

बीजेपी में कैसे ताकतवर हुए प्रधान

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक राजनीति में धर्मेंद्र प्रधान के ग्राफ को ऊपर उठाने में सबसे बड़ा हाथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का है. गृहमंत्री के साथ प्रधान का गहरा व्यक्तिगत संबंध है, जिसकी वजह से वो बीजेपी की राजनीति में बेहद ताकतवर नेता के तौर पर उभरे.

ये भी पढ़ें- ‘मैंने जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा…’ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दिया इस्तीफा, बताई बड़ी वजह

धर्मेंद्र और अमित शाह के बीच दोस्ती की पटकथा आज से करीब 25 साल पहले लिखी गई थी. जब अदालत के आदेश पर अमित शाह को गुजरात से निकाल दिया गया था. कहा जाता है कि उस समय उन्होंने कुछ समय धर्मेंद्र प्रधान के तालचेर स्थित घर में गुजारा था. यहीं से शाह और प्रधान की दोस्ती की शुरुआत हुई थी. इसके बाद जब अमित शाह बीजेपी में ताकतवर हुए तो इसका फायदा धर्मेंद्र प्रधान को भी मिला.

-भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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