दक्षिण अफ्रीका में हुआ G20 सम्मेलन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा. पीएम मोदी ने सम्मेलन में विकासशील देशों की आवाज बेहद मजबूती से उठाई. अमेरिका ने इस सम्मेलन का बायकॉट किया, यह बात सुर्खियों में रही. क्या इससे G20 की विश्व राजनीति में भूमिका कमजोर होगी या फिर पहले से ज्यादा मजबूत? G20 नेताओं ने जोहान्सबर्ग सम्मलेन में 122 पेज का घोषणापत्र जारी किया गया. यह घोषणा ‘सॉलिडैरिटी (एकजुटता), इक्वॉलिटी (समानता), और सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता)’ को सम्मेलन की आधारशिला पर आधारित रहा. इसमें विशेष रूप से गरीब देशों पर ध्यान, जलवायु आपदाओं, देशों का कर्ज और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर केंद्रीत रहा.
सम्मेलन के एजेंडा में आर्टिफिशल इंटेलीजेंस (AI) और इनोवेशन को महत्व दिया गया. “उद्योगकरण, रोज़गार और समानता” (इंक्लूसिव इंडस्ट्रियलीसैशन, एम्प्लॉयमेंट, रेडसिंग इनेक्वालिटी) G20 की उच्च प्राथमिकताओं में हैं.
दक्षिण अफ्रीका के G20 सम्मेलन 2025 में ऊर्जा और क्लाइमेट को लेकर बड़ा एजेंडा रहा. एक बहुत बड़ा लक्ष्य है कि 2030 तक वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता को तीन गुना बढ़ाया जाए. साथ ही, ऊर्जा दक्षता की दर को भी दोगुना करने की मांग की गई है. इसके लिए कम लागत वाला फाइनेंसिंग और नवीन वित्तीय साधनों का जोर दिया गया है, ताकि विकासशील देशों को आर्थिक सहायता मिल सके. तकनीक हस्तांतरण को आपसी सहमति पर आधारित शर्तों पर बढ़ावा देने की बात कही गई है.
विकासशील देशों के कर्ज और असमानता को लेकर G20 में वैश्विक कर्ज की समस्या को गंभीरता से उठाया गया. खासकर उन देशों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं. दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता ने ग्लोबल वेल्थ असमानता को भी एक प्राथमिकता बनाया. उन्होंने एक टास्कफोर्स लॉन्च किया है जो आर्थिक समानता और वैश्विक गरीबी की स्थिति देखेगा. तकनीकी तौर पर विकसित देशों की रफ्तार के साथ बाद भी करने के लिए इनोवेशन, टेक्नोलॉजी और एआई के विकास पर जोर दिया गया.
यह G20 सम्मेलन पहली बार अफ्रीकी महाद्वीप (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका) में हुआ. यह इस बात का प्रतीक माना जा रहा है कि विकासशील देशों खासकर अफ्रीका को ग्लोबल मंच पर अधिक आवाज़ मिल रही है. दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता ने “ग्लोबल साउथ” (विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं) के मुद्दों पर जोर दिया है, जैसे कि कर्ज, ऊर्जा संक्रमण, असमानता. इस सम्मेलन में यह संदेश गया कि G20 सिर्फ अमीर देशों का क्लब नहीं है, बल्कि विकासशील देशों के लिए भी अहम मंच बन रहा है.
घोषणापत्र में महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) तक पहुंच को रणनीतिक रूप से बढ़ाने की बात कही गई है, क्योंकि ये नवीकरणीय ऊर्जा और हाइ-टेक सेक्टर के लिए ज़रूरी हैं.
आपदाओं से लड़ने की क्षमता बढ़ाने (disaster resilience) पर जोर है — यह G20 एजेंडा में शामिल एक बड़ा बिंदु है. इसका मकसद यह है कि देश प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु झटकों आदि से बेहतर तरीके से निपट सकें.
महिला सशक्तिकरण (वीमेन एपावरमेंट) G20 घोषणा में शामिल है. AajTak की रिपोर्ट में कहा गया है कि “महिला-नेतृत्व विकास” पर जोर है. यह एक संकेत है कि सिर्फ आर्थिक मुद्दे ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दे — जैसे लैंगिक समानता भी G20 के एजेंडा का हिस्सा हैं.
विदेशी मामलों की जानकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में आयोजित G20 सम्मेलन को भारत ने पूरी मजबूती के साथ लीड किया. पीएम मोदी ने अपनी बात न सिर्फ स्पष्टता से रखी, बल्कि विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ के मुद्दों को भी वैश्विक मंच पर मजबूती से उठाया. हालांकि इस बार सम्मेलन को लेकर सबसे बड़ी सुर्खी रही. अमेरिका द्वारा G20 सम्मेलन का बायकॉट किया जाने से सभी देश के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है. G20 के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी सदस्य देश ने सम्मेलन से दूरी बनाई हो. लेकिन सवाल उठता है. क्या इससे G20 की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा. संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि-
अमेरिका के बायकॉट का G20 सम्मेलन पर कोई असर नहीं पड़ा. सम्मेलन पूरी तरह सफल रहा और भविष्य में भी इससे कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा. संयुक्त राष्ट्र की भूमिका लगातार कमजोर दिख रही है. और ऐसे में G20 जैसे मंच विकासशील देशों की असली आवाज बनते जा रहे हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि दुनिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक हालात में G20 जैसे मंच और भी ज्यादा प्रासंगिक होते जा रहे हैं. और अमेरिका के बायकॉट के बाद अब सबसे बड़ा सवाल है. क्या 2026 में, जब अमेरिका खुद G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, तब उसका रुख कैसा रहेगा दक्षिण अफ्रीका में G20 सम्मेलन भले ही अमेरिका के बायकॉट के बावजूद सफल रहा, लेकिन अब निगाहें 2026 पर टिकी होंगी… जब अमेरिका खुद G20 की मेजबानी करेगा. दुनिया देखना चाहेगी कि तब उसका रवैया क्या होता है.
ये भी पढ़ें: असली दर्द क्या है? हार के बाद टूटा PK का मौन; दोगले विपक्ष और NDA निशाना
G20 की स्थापना 1999 में हुई थी. इसका मूल उद्देश्य आर्थिक और वित्तीय स्थिरता पर चर्चा करना था, खासकर उन देशों में जहाँ अर्थव्यवस्थाएं तेजी से उभर रही थीं. इसमें 19 प्रमुख देश और यूरोपीय संघ (EU) शामिल है. शुरू में यह सिर्फ वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों का मंच था. लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इसे नेताओं (राष्ट्रपति / प्रधानमंत्री) के स्तर पर शिखर सम्मेलन में बदल दिया गया. अब G20 सिर्फ आर्थिक संकटों तक सीमित नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, विकास, स्वास्थ्य और वैश्विक असमानता जैसे मुद्दों पर भी काम करता है. G20 की अध्यक्षता (प्रेजिडेंसी) हर साल किसी सदस्य देश को सौंप दी जाती है, और उस देश के एजेंडा के अनुरूप शिखर सम्मेलन पूर्व तय किए जाते हैं. G20 का कोई स्थायी मुख्यालय (परमानेंट सीक्रेटरीएत) नहीं है. इसके बजाए “ट्रोइका” प्रणाली है — जिसमें पिछला, वर्तमान, और आगामी अध्यक्ष मिलकर अगले एजेंडा की दिशा तय करते हैं.
Indian Festival 2026: Flipkart Big Billion Days और Amazon Great Indian Festival Sale शुरू हो…
श्रावस्ती में शटडाउन के बावजूद 11 हजार वोल्ट की बिजली लाइन चालू होने से दो…
नई दिल्ली में आयोजित ‘सेवा संकल्प – राष्ट्रनिर्माण के 25 साल’ समारोह में सेवा, सद्भाव…
नाना पाटेकर के निधन के बाद उनकी पत्नी नीलकंती पाटेकर चर्चा में हैं. जानिए मराठी…
दिल्ली हाईकोर्ट जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति न मिलने के…
Donald Trump On Nobel Peace Prize: नोबेल शांति पुरस्कार 2026 के ऐलान से पहले डोनाल्ड…