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भारत में CSR खर्च की चौंकाने वाली सच्चाई, क्या 17,967 करोड़ रुपये सही जगह जा रहे हैं?

भारत की शीर्ष कंपनियों ने साल 2023-24 में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत कुल ₹17,967 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. यह आंकड़ा सुनने में भले ही प्रभावशाली लगे, लेकिन जब हम ज़मीनी हकीकत पर नज़र डालते हैं, तो कई सवाल खड़े होते हैं. क्या वाकई यह पैसा उन क्षेत्रों में जा रहा है जहां इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है? या फिर यह सिर्फ कागज़ों पर दिखावे तक ही सीमित रह गया है?

HDFC बैंक ₹945.31 करोड़ के साथ सबसे ऊपर है, इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज ₹900 करोड़ और TCS ₹827 करोड़ के साथ CSR में शीर्ष खर्च करने वालों में शामिल हैं. ONGC, टाटा स्टील, ICICI बैंक, IOC, इंफोसिस, ITC और पावर ग्रिड कॉर्प जैसी कंपनियों ने भी सैकड़ों करोड़ रुपये CSR में लगाए हैं. इन कंपनियों का मार्केट कैप भी लाखों करोड़ में है, जिससे स्पष्ट है कि वे देश की सबसे बड़ी और आर्थिक रूप से सशक्त संस्थाएं हैं.

खर्च तो हो रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या कहती है?

CSR का मूल उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है – जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, और बच्चों के अधिकार. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद देश के कई हिस्सों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी बनी हुई है. लाखों बच्चे आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं, अस्पतालों में संसाधनों की कमी है, और गांवों में पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है.

कई बार देखा गया है कि CSR फंड का उपयोग केवल नाम कमाने, प्रचार-प्रसार या राजनैतिक लाभ के लिए किया जाता है. कई NGOs और संस्थाएं सिर्फ कागज़ों पर प्रोजेक्ट दिखाकर फंड हड़प लेती हैं. पारदर्शिता की कमी और निगरानी के अभाव में असली ज़रूरतमंद तक यह सहायता नहीं पहुंच पाती. इससे यह सवाल उठता है कि क्या CSR वास्तव में एक सामाजिक जिम्मेदारी है या फिर सिर्फ एक कानूनी बाध्यता बनकर रह गई है?

सही दिशा में CSR खर्च से समाज में बड़ा बदलाव संभव

अगर ₹17,967 करोड़ रुपये का यह खर्च सही दिशा में और ईमानदारी से हो, तो इससे करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बदली जा सकती है. इसके लिए ज़रूरी है कि CSR परियोजनाओं की स्वतंत्र जांच हो, हर फंड के उपयोग का लेखा-जोखा सार्वजनिक हो और नागरिक समाज इसमें सक्रिय भागीदारी करे. जब तक पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक इतनी बड़ी रकम का भी कोई ठोस असर नहीं दिखेगा.

CSR को एक औपचारिकता के बजाय असली सामाजिक बदलाव का जरिया बनाना होगा. कंपनियों, सरकार और जनता – सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि यह पैसा सिर्फ खर्च न हो, बल्कि उसका असर समाज में दिखाई दे.

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-भारत एक्सप्रेस 

मिताली चंदोला, एडिटर, स्पेशल प्रोजेक्ट्स

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