भारत अब सिर्फ “दुनिया का बैक ऑफिस” नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग मंच पर अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है. चाहे रेलवे हो या एयरोस्पेस, देश अब घरेलू ज़रूरतों तक सीमित नहीं, बल्कि निर्यात की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालिया गुजरात यात्रा सिर्फ एक औपचारिक उद्घाटन नहीं थी, बल्कि भारत के औद्योगिक इरादों का स्पष्ट संकेत थी. दाहोद में लोकोमोटिव निर्माण प्लांट का लोकार्पण और देश में निर्मित अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक इंजन की शुरुआत यह दिखाता है कि भारत अब ‘मेड इन इंडिया, मेड फॉर द वर्ल्ड’ की नीति पर काम कर रहा है.
इन इंजनों की खास बात यह है कि वे पारंपरिक डीज़ल इंजन नहीं, बल्कि ऊर्जा की बचत करने वाले रीजेनेरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम से लैस हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, ये इंजन यूरोपीय और अफ्रीकी बाज़ारों के लिए बनाए जा रहे हैं—यह भारत की उत्पादन क्षमता में आए भारी बदलाव का संकेत है.
इसके अलावा, भारतीय रेल को हाल ही में गिनी से ₹2,000 करोड़ का ऑर्डर मिला है, जिसमें बिहार के मढ़ौरा प्लांट में 140 डीज़ल इंजन बनाए जाएंगे. यह भारत के रेलवे इतिहास की सबसे बड़ी निर्यात डील्स में से एक मानी जा रही है.
जहां रेलवे तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, वहीं भारत का एयरोस्पेस क्षेत्र भी अब ऊंचाइयों को छूने लगा है. नागरिक उड्डयन सचिव समीर कुमार सिन्हा के अनुसार, दुनिया की कई नामी ऑरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) अब हर साल भारत से $2 बिलियन से ज़्यादा के एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सेवाएं ले रही हैं.
ऑल इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज़ के मुताबिक, भारत का एयरोस्पेस और डिफेंस मार्केट 2030 तक $70 बिलियन तक पहुंच सकता है. इस दिशा में भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है—एयरोस्पेस इंडिया एसोसिएशन (AIA) की स्थापना. इसका लक्ष्य है भारत के एयरोस्पेस निर्यात को आने वाले 10 वर्षों में 10 गुना बढ़ाकर $20 बिलियन तक पहुंचाना.
नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने सरकार की रणनीति स्पष्ट की—स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देना, मज़बूत सप्लाई चेन बनाना और भारत को वैश्विक एविएशन हब के रूप में स्थापित करना. इसके तहत घरेलू रीजनल एयरक्राफ्ट प्रोग्राम को तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है.
भारत को एविएशन सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग में एक मजबूत खिलाड़ी बनाने के लिए सरकार ने टैक्स संरचना को भी सरल बनाया है. जुलाई 2024 में सरकार ने सभी विमान और इंजन पुर्जों पर 5% यूनिफॉर्म IGST लागू किया. इससे पहले इस सेक्टर में 5% से 28% तक का टैक्स लागू होता था, जिससे कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट में दिक्कत होती थी और लागत बढ़ जाती थी.
इस एकसमान कर प्रणाली से अब भारत में MRO (मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल) सेवा प्रदाताओं के लिए माहौल अनुकूल हो गया है और यह देश को एविएशन सर्विस हब बनाने की दिशा में मदद करेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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