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डिजिटल दौर में भी सिर चढ़कर बोल रहा किताबों का जादू; बुक फेयर में उमड़ी भारी भीड़, जानें क्या है खास?

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में इन दिनों किताबों का कुंभ लगा हुआ है. अगर आप भी उन लोगों में से हैं जिन्हें पन्नों की खुशबू और नई कहानियों से प्यार है, तो ‘विश्व पुस्तक मेला’ (World Book Fair) आपकी अगली मंजिल होनी चाहिए. इस बार का मेला सिर्फ किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि 73 सालों की उस विरासत का जश्न है जिसने देश में पढ़ने की संस्कृति को जिंदा रखा है.

मेले का नजारा कुछ ऐसा है कि जिधर नजर घुमाओ, बस किताबें ही किताबें नजर आती हैं. इस साल का आयोजन भव्य है. 1000 से ज्यादा छोटे-बड़े पब्लिशर्स और लगभग 6000 स्टॉल्स के साथ यह मेला किसी मिनी शहर जैसा लग रहा है. यहां सिर्फ भीड़ नहीं है, बल्कि एक ऐसा माहौल है जहां साहित्य प्रेमियों की रूह को सुकून मिलता है. भारत एक्सप्रेस के लिए जब हमने इस मेले की जमीनी हकीकत जानी, तो कई दिलचस्प बातें सामने आई.

एक लंबी और शानदार यात्रा

मेले के शोर-शराबे के बीच हमारी नजर एक ऐसे खास प्रकाशन (पब्लिशर) पर पड़ी, जिसका इतिहास देश के आजाद होने के कुछ ही साल बाद, यानी 1952 में शुरू हुआ था. 73 सालों का यह सफर सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि ज्ञान बांटने का रहा है. इस स्टॉल की खासियत यह है कि यहां हर उम्र और हर पसंद के इंसान के लिए कुछ न कुछ मौजूद है.

अक्सर हमें शिकायत रहती है कि एक ही छत के नीचे सब कुछ नहीं मिलता, लेकिन यहां मामला अलग है. चाहे आप राजनीति की पेचीदगियों को समझना चाहते हों या अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में रुचि रखते हों, यहां सब उपलब्ध है.

क्या है यहां खास?

अगर आप स्टूडेंट हैं, तो कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स और सामान्य ज्ञान का यहां विशाल भंडार है. वहीं, अगर आप जिंदगी की भागदौड़ से थककर सुकून की तलाश में हैं, तो आध्यात्म और दर्शन की किताबें आपका इंतजार कर रही हैं. इसके अलावा:

  • खेल प्रेमियों के लिए: महान खिलाड़ियों की जीवनियां और खेल तकनीक पर आधारित पुस्तकें.
  • विज्ञान में रुचि वालों के लिए: आधुनिक रिसर्च और स्पेस से जुड़ी रोचक जानकारी.
  • बच्चों के लिए: रंग-बिरंगी कहानियों और शिक्षाप्रद किताबों का अलग ही कोना है.

डिजिटल दौर में भी लोगों की पहली पसंद

इस मेले की सबसे अच्छी बात इसकी ‘विविधता’ है. यहां आकर आपको महसूस होगा कि डिजिटल दौर में भी किताबों का क्रेज कम नहीं हुआ है. अगर आप किताबों के शौकीन हैं, तो यकीन मानिए आप यहां से खाली हाथ या मायूस होकर तो बिल्कुल नहीं लौटेंगे. यह मेला एक याद दिलाने जैसा है कि एक अच्छी किताब सौ दोस्तों के बराबर होती है.

ये भी पढ़ें: घर की नींव खोदते-खोदते खुली ‘किस्मत’, पर बच्चे की ईमानदारी के आगे सोने की चमक भी पड़ी फीकी

-भारत एक्सप्रेस

हिमांशु दुबे

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