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मानसून सत्र में भारी बवाल: जानिए किस नियम के तहत सस्पेंड होते हैं सांसद और क्या कोर्ट में दे सकते हैं चुनौती?

संसद का मानसून सत्र इस बार हंगामे की वजह से चर्चा में है. अलग-अलग मुद्दों को लेकर विपक्षी दलों के सांसद सदन के अंदर और बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. NEET पेपर लीक, राम मंदिर चंदा विवाद और सांसदों के दलबदल जैसे मुद्दों पर जोरदार विरोध देखने को मिला है.

31 जुलाई को सांसद पप्पू यादव साधु के वेश में संसद पहुंचे और राम मंदिर चंदा चोरी के आरोपों को लेकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया. उन्होंने अपने साथ दानपात्र भी रखा था. इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने भी पश्चिम बंगाल में सांसदों के कथित दलबदल से जुड़े पोस्टर पहनकर विरोध जताया था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई विपक्षी नेता भी अलग-अलग मौकों पर संसद परिसर में प्रदर्शन कर चुके हैं.

संसद में अनुशासन बनाए रखने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों के अलग नियम हैं. इन नियमों के तहत पीठासीन अधिकारी यानी लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है.

लोकसभा में कैसे होती है कार्रवाई?

लोकसभा में अनुशासन बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी लोकसभा स्पीकर यानी पीठासीन अधिकारी की होती है. इसके लिए नियम तय हैं:

  • नियम 373: अगर स्पीकर को यह लग जाए कि कोई सांसद जानबूझकर सदन की कार्यवाही को डिस्टर्ब कर रहा है, तो वे उसे उसी दिन के लिए तुरंत सदन से बाहर जाने का आदेश दे सकते हैं.
  • नियम 374: अगर कोई माननीय स्पीकर के निर्देशों को बिल्कुल अनसुना कर दे और लगातार हंगामा जारी रखे, तो स्पीकर उस सांसद को बचे हुए पूरे सत्र के लिए निलंबित करने का प्रस्ताव सदन में ला सकते हैं.
  • नियम 374ए (सबसे सख्त नियम): अगर मामला बहुत ज्यादा गंभीर हो जैसे कोई सांसद सीधे वेल में आकर नारेबाजी करने लगे, कागजात फाड़ने लगे या फिर जानबूझकर भारी हंगामा करे, तो स्पीकर को स्पेशल पावर मिलती है. इस नियम के तहत सांसद स्वतः ही बचे हुए पूरे सत्र के लिए सस्पेंड हो जाता है.

राज्यसभा में क्या है नियम?

दूसरी तरफ, उच्च सदन यानी राज्यसभा में शांति बनाए रखने की कमान सभापति के हाथ में होती है. यहां भी सांसदों की मनमानी रोकने के लिए इंतजाम हैं:

  • नियम 255: यदि सभापति को लगता है कि किसी सदस्य का रवैया सदन का माहौल खराब कर रहा है, तो वे उसे तुरंत सदन छोड़कर जाने का निर्देश दे सकते हैं. हालांकि, यह निलंबन सिर्फ उसी एक दिन के लिए होता है.
  • नियम 256: अगर कोई सदस्य बार-बार नियमों की धज्जियां उड़ाए और सभापति के अधिकारों की परवाह न करे, तो उसे पूरे सत्र के लिए या सत्र के कुछ चुनिंदा दिनों के लिए सस्पेंड किया जा सकता है.

क्या निलंबन वापस लिया जा सकता है?

हां, कुछ परिस्थितियों में निलंबन वापस लिया जा सकता है. अगर निलंबित सांसद अपने व्यवहार पर खेद जताते हैं या माफी मांगते हैं, तो सभापति या सदन के फैसले के आधार पर निलंबन खत्म किया जा सकता है. इसके अलावा सदन में प्रस्ताव लाकर भी निलंबन हटाया जा सकता है.

क्या इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

संसद के अंदर अनुशासन और कार्यवाही से जुड़े मामलों में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होता है. सांसद का निलंबन सदन की आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसे सीधे न्यायालय में चुनौती देना आसान नहीं होता है. इस तरह संसद में विरोध और प्रदर्शन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए अध्यक्ष और सभापति को अनुशासन बनाए रखने के लिए विशेष अधिकार दिया गया हैं.

ये भी पढ़ें- ‘पप्पू-राहुल को मारो जूता…’ संसद में राम मंदिर चढ़ावे चोरी पर ड्रामा, भड़के अयोध्या के संत

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-भारत एक्सप्रेस

Shreyansh Choubey

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