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पत्रकारिता से राजनीति और कारोबार तक, आर.के. सिन्हा का सफर थमा; 75 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर देशभर में अपनी अलग पहचान बनाने वाले डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा (आर.के. सिन्हा) अब हमारे बीच नहीं रहे. पत्रकारिता, समाजसेवा, कारोबार और राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाने वाले आर.के. सिन्हा का नोएडा स्थित उनके आवास पर लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. उनके जाने की खबर से बिहार ही नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर है. उन्होंने अपने जीवन में जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है.

भोजपुर के गांव से शुरू हुआ था संघर्ष का सफर

आर.के. सिन्हा का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के बहियारा गांव में हुआ था. एक सामान्य परिवार से आने वाले सिन्हा ने अपनी मेहनत, लगन और दूरदर्शिता के दम पर देश में खास पहचान बनाई. उनकी जिंदगी का शुरुआती दौर पत्रकारिता से जुड़ा रहा. वे केवल खबरें लिखने वाले पत्रकार नहीं थे, बल्कि घटनाओं को करीब से देखने और सच को सामने लाने का साहस भी रखते थे.

साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई. उस दौर में पत्रकारिता आसान नहीं थी. सीमित संसाधनों के बीच काम करते हुए उनकी मासिक कमाई महज 230 से 250 रुपये के आसपास थी. इसके बावजूद उन्होंने अपने काम के प्रति कभी समझौता नहीं किया.

जेपी के सुझाव ने बदल दी जिंदगी की दिशा

आर.के. सिन्हा के जीवन में 1974 का साल बेहद अहम साबित हुआ. जयप्रकाश नारायण से प्रेरणा और सुझाव मिलने के बाद उन्होंने पूर्व सैनिकों को सम्मानजनक रोजगार देने की दिशा में कदम बढ़ाया. इसी सोच के साथ उन्होंने पटना में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) की शुरुआत की.

शुरुआत में यह पहल मुख्य रूप से पूर्व सैनिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी. लेकिन धीरे-धीरे सिन्हा की मेहनत और व्यावसायिक सोच ने इसे एक बड़े कारोबारी समूह का रूप दे दिया. आज SIS देश की प्रमुख सिक्योरिटी और बिजनेस सपोर्ट सर्विसेज कंपनियों में गिनी जाती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुकी है.

जिस काम की शुरुआत एक छोटे प्रयास के रूप में हुई थी, वह आगे चलकर हजारों करोड़ रुपये के कारोबार वाले समूह में बदल गया. इस सफर में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के अवसर मिले. आर.के. सिन्हा की खासियत यह थी कि उन्होंने कारोबार को सिर्फ मुनाफे का जरिया नहीं माना, बल्कि इसे रोजगार और सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा.

जेपी आंदोलन में भी निभाई अहम भूमिका

पत्रकारिता के दिनों में आर.के. सिन्हा सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से भी गहराई से जुड़े रहे. 1974-75 के जेपी आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही. उस दौर के घटनाक्रम और जनआंदोलन के अनुभवों को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जन आंदोलन’ में भी जगह दी.

वे बेबाक और निर्भीक पत्रकार के रूप में जाने जाते थे. सत्ता और व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने में वे पीछे नहीं हटते थे. उनकी लेखनी में सामाजिक सरोकार और देश की परिस्थितियों को समझने की कोशिश साफ दिखाई देती थी.

शिक्षा और समाजसेवा को भी दी प्राथमिकता

कारोबार और राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद शिक्षा और समाजसेवा उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही. वे मानते थे कि समाज में वास्तविक बदलाव तभी आएगा, जब गरीब और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा और आगे बढ़ने के बराबर अवसर मिलेंगे.

इसी सोच के तहत उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए कई प्रयास किए और देहरादून में इंडियन पब्लिक स्कूल की स्थापना भी की. इसके अलावा जैविक खेती को बढ़ावा देने और ग्रामीण समाज के विकास से जुड़े कामों में उनकी दिलचस्पी रही. समाज के कमजोर वर्गों को आगे लाने की उनकी कोशिशें उनके व्यक्तित्व का अहम पहलू थीं.

जनसंघ से भाजपा तक का लंबा राजनीतिक सफर

राजनीति में भी आर.के. सिन्हा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही. पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपर्क और प्रेरणा से वे भारतीय जनसंघ से जुड़े थे. बाद में भारतीय जनता पार्टी के गठन और संगठन को मजबूत करने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. उन्हें भाजपा के संस्थापक सदस्यों में गिना जाता है.

संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया. वर्ष 2014 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और 2020 तक उच्च सदन में बिहार का प्रतिनिधित्व किया. इस दौरान उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी भागीदारी दर्ज कराई.

पीछे छोड़ गए प्रेरणा और संघर्ष की मिसाल

आर.के. सिन्हा का जीवन कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने और अपनी पहचान बनाने की कहानी है. एक तरफ उन्होंने पत्रकार के रूप में देश की महत्वपूर्ण घटनाओं को करीब से देखा, तो दूसरी तरफ हजारों लोगों को रोजगार देने वाली कंपनी खड़ी की. राजनीति में संगठन को मजबूती दी और समाजसेवा के जरिए शिक्षा तथा ग्रामीण विकास के लिए भी काम किया.

उनके निधन से बिहार ने अपना एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया है, जिसने छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए पटना लाया जाएगा. पाटलिपुत्र स्थित अन्नपूर्णा भवन में लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे.

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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