राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर पहुंचे. यहां उन्होंने ‘हिंदू सम्मेलन’ को संबोधित किया और महत्वपूर्ण बातें कहीं. उन्होंने राष्ट्रवाद, हिंदू समाज की जिम्मेदारी, शक्ति की परिभाषा और सामाजिक समरसता पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि अगर देश में कुछ होता है तो इसका जवाब हिंदुओं की ही देना होगा. आइये जानें कार्यक्रम में मोहन भागवत ने और क्या-क्या कहा है?
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर भारत में कुछ अच्छा या बुरा होता है, तो हिंदुओं से पूछा जाएगा. क्योंकि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं है, बल्कि यह देश के चरित्र का प्रतीक है. भागवत के अनुसार, जो लोग एकीकरण और सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, वे ही देश के सच्चे चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. सदियों के आक्रमणों के बावजूद यह परंपरा बची रही है. ऐसे लोग हिंदू कहलाते हैं और उनकी भूमि भारत कहलाती है.
भागवत ने वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और ‘शक्ति’ के अर्थ को विस्तार से समझाया. उन्होंने कहा कि शक्ति में केवल सशस्त्र बल ही नहीं, बल्कि बुद्धि, सिद्धांत और नैतिक मूल्य भी शामिल होते हैं. दुनिया भारत से कुछ उम्मीदें रखती है. जब हमारे पास पर्याप्त शक्ति और प्रभाव होगा तभी हम विश्व में सार्थक योगदान देने में सक्षम होंगे. अगर हम अच्छे और ईमानदार बनेंगे, तो देश भी वैश्विक मंच पर इन गुणों को प्रदर्शित करेगा.
सामाजिक चुनौतियों और अन्याय से लड़ने के लिए उन्होंने रामायण का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि भगवान राम ने भी रावण से बातचीत के जरिए युद्ध टालने की कोशिश की थी, लेकिन अंत में उन्हें हथियार उठाने पड़े. हमें भी अन्याय के खिलाफ कदम-दर-कदम लड़ना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ न तो किसी का विरोध करता है और न ही किसी से प्रतिस्पर्धा में है. संघ का उद्देश्य केवल एक मजबूत और सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण करना है.
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मोहन भागवत ने हिंदू समाज की विविधता को उसकी ताकत बताया. उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा हमेशा से समावेशी रही है. यह रीति-रिवाजों, खान-पान, भाषा और जाति में विविधता को अपनाती है और इन मतभेदों को संघर्ष का कारण नहीं बनने देती. भागवत ने हिंदुओं से अपील की कि वे जाति, भाषा या पेशे की परवाह किए बिना एक-दूसरे को मित्र बनाएं. “संघ पहल करेगा, लेकिन समुदाय को इसका नेतृत्व करना होगा.
आर्थिक स्वतंत्रता पर जोर देते हुए भागवत ने ‘लोकल फॉर वोकल’ का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि हमें स्थानीय वस्तुएं खरीदनी चाहिए. जो चीज यहां नहीं बन सकती, केवल उसे ही बाहर से खरीदा जाए. हमने आत्मनिर्भरता का मार्ग चुना है. जब दुनिया वैश्वीकरण की बात करती है तो वे ‘बाजार’ (Market) खोजते हैं, जबकि भारत ‘विश्व परिवार’ (Global Family) की भावना रखता है. युवा सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने छात्रों से कहा कि वे ज्ञान और कौशल अर्जित करने के लिए विदेश जरूर जाएं, लेकिन उस ज्ञान का उपयोग भारत के विकास और भविष्य निर्माण में करें.
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