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बिहार की सियासत में तारापुर का दबदबा! लखनपुर के लाल से ग्रामीणों को विकास की आस, गांव में मना उत्सव

बिहार की सियासत में आज एक नया अध्याय जुड़ गया है और इस सुनहरे पन्ने का केंद्र मुंगेर जिले का छोटा सा गांव लखनपुर बना है. यहां की गलियों में खेलने वाला, कभी मदरसे में दोस्तों के साथ क्रिकेट की पिच पर पसीना बहाने वाला एक लड़का अब बिहार की सबसे बड़ी कुर्सी यानी मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होने जा रहा है. जैसे ही यह खबर आई कि सम्राट चौधरी बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे, पूरे तारापुर विधानसभा क्षेत्र में मानों खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा.

यह सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए एक भावनात्मक जीत है. गांव के बुजुर्गों की आंखों में गर्व के आंसू हैं, तो युवाओं के चेहरे पर विकास की नई उम्मीदें है.

क्रिकेट के शौकीन है ‘सम्राट’

सम्राट चौधरी की शख्सियत को करीब से जानने वाले कहते हैं कि वे सत्ता के शिखर पर भले पहुंच गए हों, लेकिन उनकी जड़ें आज भी लखनपुर की मिट्टी से जुड़ी हैं. उनके बचपन के दोस्त मोहम्मद शम्स राजा ‘गोल्डी’, जिन्होंने उनके साथ मदरसे में पढ़ाई की, पुरानी यादें ताजा करते हुए भावुक हो जाते हैं.

गोल्डी बताते हैं,

“सम्राट को बचपन से ही क्रिकेट का जुनून था. वे न सिर्फ खुद एक मंझे हुए खिलाड़ी थे, बल्कि पूरी टीम को साथ लेकर चलना जानते थे. आज वे बिहार की टीम की कप्तानी करने जा रहे हैं, तो हमें ज़रा भी हैरानी नहीं है, क्योंकि नेतृत्व करने का गुण उनके खून में है.”

गांव के ही अशरफ रजा रॉकी और बबलू अंसारी कहते हैं कि सम्राट के लिए कभी जाति-पाति या धर्म की दीवारें मायने नहीं रखतीं. वे आज भी जब गांव आते हैं, तो उसी सादगी से मिलते हैं जैसे बरसों पहले मिला करते थे. लोगों का कहना है कि उनकी यही ‘डाउन टू अर्थ’ छवि उन्हें एक सच्चा जननायक बनाती है.

विरासत में मिली राजनीति

सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान खुद के दम पर बनाई है. उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के कद्दावर स्तंभ रहे हैं. पुराने लोग बताते हैं कि शकुनी जी का रसूख ऐसा था कि बड़े-बड़े मुख्यमंत्री भी अहम फैसलों पर उनसे मशविरा करते थे. मां पार्वती देवी भी विधायक रहीं, यानी घर में ही सियासत की पाठशाला थी.

कार्यकर्ताओं के बीच सम्राट चौधरी की छवि किसी ‘रॉबिन हुड’ जैसी है. वे उन चंद नेताओं में से हैं जो हजारों की भीड़ में भी अपने छोटे से छोटे कार्यकर्ता को नाम से पुकार कर उसका हौसला बढ़ा देते हैं. कार्यकर्ताओं को सम्मान दिलाना और उन्हें आगे बढ़ाना उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा रहा है.

सबसे युवा मंत्री से मुख्यमंत्री तक का सफर

सम्राट चौधरी का सफर उपलब्धियों से भरा रहा है. साल 2000 में वे जब पहली बार विधायक बने, तो लालू प्रसाद यादव की कैबिनेट में उन्हें सबसे कम उम्र के मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. राजद से सफर शुरू हुआ और फिर भाजपा में आकर उन्होंने अपनी संगठन क्षमता का लोहा मनवाया.

मार्च 2023 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनने से लेकर उपमुख्यमंत्री और अब मुख्यमंत्री बनने तक, उन्होंने गृह, वित्त और पंचायती राज जैसे भारी-भरकम विभागों को बखूबी संभाला है.

अब तारापुर को है ‘नालंदा मॉडल’ का इंतज़ार

तारापुर और मुंगेर के लोगों की उम्मीदें अब आसमान छू रही हैं. लोगों का कहना है कि जिस तरह पिछले दशकों में नालंदा का कायाकल्प हुआ, अब वैसा ही विकास उनके क्षेत्र में भी दिखेगा. बेहतर सड़कें, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और युवाओं के लिए रोजगार. ये वो सपने हैं जो अब लखनपुर की मिट्टी से जुड़े इस मुख्यमंत्री से हर ग्रामीण देख रहा है.

लखनपुर स्थित उर्दू मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक मोहम्मद ताबीर कहते हैं,

“सम्राट और उनके पिता दोनों ‘जुबान के पक्के’ रहे हैं. उन्होंने जो कह दिया, वो पत्थर की लकीर है.”

आज लखनपुर में ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, मिठाइयां बंट रही हैं.

यह भी पढ़ें: Samrat Choudhary Net Worth: बिहार के नए सीएम सम्राट चौधरी का ‘नेटवर्थ’ देख रह जाएंगे दंग! जानें कितनी संपत्ति के मालिक हैं?

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-भारत एक्सप्रेस

Shreyansh Choubey

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