Sojat Mehndi industry loss Iran US conflict: राजस्थान के सोजत की विश्व प्रसिद्ध मेहंदी, जिसकी लाली सात समंदर पार तक बिखरती थी, आज ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण युद्ध की भेंट चढ़ती नजर आ रही है. पिछले 30 दिनों में इस फलते-फूलते उद्योग को करीब 250 करोड़ रुपये का तगड़ा झटका लगा है.
निर्यात पर टिके इस कारोबार के ठप होने से न केवल व्यापारियों की कमर टूट गई है बल्कि सोजत की गलियों में गूंजने वाली मशीनों की आवाज भी अब खामोश होने लगी है. हालात इतने गंभीर हैं कि 4000 करोड़ रुपये का सालाना टर्नओवर वाला यह सेक्टर अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.
सोजत से निकलने वाली मेहंदी का एक बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट, यूरोप और इजरायल जाता है. लेकिन लाल सागर (Red Sea) मार्ग प्रभावित होने और हवाई हमलों के डर से शिपिंग रूट पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है. निर्यातक विनोद लोढ़ा जैन के अनुसार, करीब 80 फीसदी माल होल्ड पर है, जबकि 30 फीसदी शिपमेंट मुंबई और दिल्ली के एयर कार्गो में अटक गया है. वैकल्पिक लंबे रास्तों के इस्तेमाल से माल भाड़ा दोगुना हो गया है, जिससे विदेशी खरीदारों ने नए ऑर्डर देने से हाथ खींच लिए हैं.
सोजत में संचालित 100 से अधिक छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों में से अधिकांश अब बंदी की कगार पर हैं. व्यवसायी नितेश अग्रवाल ने बताया कि युद्ध के कारण एलपीजी (LPG) की भारी किल्लत हो गई है, जो मेहंदी सुखाने और प्रोसेसिंग के लिए अनिवार्य है. इसके अलावा यूरोप से आने वाले रसायनों की सप्लाई रुकने और उत्पादन महज 10 फीसदी रह जाने से फैक्ट्रियों में ताले लटकने लगे हैं. जो उद्योग कभी चौबीसों घंटे चलता था, वहां अब केवल सन्नाटा और अनिश्चितता का माहौल है.
सोजत के मेहंदी उद्योग में करीब 5 हजार श्रमिक काम करते हैं, जिनमें से 80 फीसदी उत्तर प्रदेश, बिहार और कोटपुतली से आते हैं. काम बंद होने के कारण इन प्रवासी मजदूरों के सामने पेट पालने का संकट खड़ा हो गया है. कई मजदूर अपने गांव लौट चुके हैं, तो कुछ बचे हुए पुराने ऑर्डर्स को पूरा करने की उम्मीद में टिके हैं. 20-20 साल से इस काम में जुटे हुनरमंद हाथों के पास आज कोई काम नहीं है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.
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सोजत की मेहंदी को इसकी गुणवत्ता के लिए जीआई टैग (GI Tag) मिला हुआ है, लेकिन वैश्विक तनाव ने इस पहचान को संकट में डाल दिया है. अगर जल्द ही मिडिल ईस्ट के हालात सामान्य नहीं हुए, तो सोजत का यह पारंपरिक उद्योग पूरी तरह तबाह हो सकता है. व्यापारियों का कहना है कि लागत बढ़ने और माल न बिकने से उनका आर्थिक ढांचा ध्वस्त हो चुका है. अब सबकी नजरें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर टिकी हैं, ताकि राजस्थान की यह ‘लाल रंग’ वाली विरासत फिर से विदेशों में अपनी चमक बिखेर सके.
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-भारत एक्सप्रेस
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