तीस हजारी कोर्ट ने एक भूमि विवाद मुकदमे का 66 साल बाद निपटारा कर दिया है. इस मामले के मूल पक्षकारों की बहुत पहले ही मृत्यु हो चुकी है. अब एक स्थानीय अदालत ने कहा है कि यह मामला अपने वर्तमान स्वरूप में विचारणीय नहीं है.
तीस हजारी कोर्ट के दीवानी न्यायाधीश कपिल गुप्ता वर्ष 1959 के एक मामले पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वादी मोहन लाल ने अदालत से अनुरोध किया था बिल्डर के खिलाफ अनिवार्य निषेधाज्ञा जारी की जाए.
क्योंकि वे उनकी सहमति के बिना उनकी भूमि पर अतिक्रमण करके कॉलोनी का निर्माण कर रहे हैं. न्यायाधीश ने कहा कि यह मुकदमा खारिज किए जाने योग्य है, क्योंकि वादी का दिल्ली के बसई दारापुर क्षेत्र में स्थित भूमि पर कब्जा नहीं था. वह केवल औपचारिक आदेश जारी करवाकर राहत मांग रहा था.
डेवलपर्स पर रोक लगाने की याचिका निर्थक
प्रतिवादी के अधिवक्ता अमित कुमार ने कहा था कि कॉलोनी का निर्माण पहले ही हो चुका है. इस वजह से डेवलपर्स पर रोक लगाने की याचिका निर्थक हो गई है. अदालत ने कहा कि उसे बताया गया है कि प्रतिवादी भूखंडों की बिक्री का व्यवसाय कर रहे है. वे खुद को नजफगढ रोड पर स्थित मानसरोवर गार्डन नामक कॉलोनी का मालिक बताते हैं.
याचिका में दावा किया गया है कि छोटे लाल और अन्य प्रतिवादियों ने वर्ष 1957 में नगर नियोजन योजना के तहत मानसरोवर गार्डन कॉलोनी की मंजूरी के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के समक्ष एक लेआउट योजना पेश की थी. उसमें मोहन लाल से संबंधित विवादित भूमि को उनकी सहमति के बिना शामिल कर दिया गया था.
अदालत ने कहा कि मामला मौजूदा स्वरूप में विचारणीय नहीं है’ क्योंकि इसमें कब्जा छुड़ाने की मांग नहीं की गई है. उसमें केवल रोक लगाने की मांग की गई है. उसने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि वादी अपने दावों और आरोपों को साबित करने में विफल रहा है.
-भारत एक्सप्रेस