TMC rebel MPs split NCPI: पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल होते ही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है. विधायकों के बाद अब पार्टी के सांसदों में भी खूंखार भगदड़ मच गई है. एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाले घटनाक्रम में, टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से पूरे 20 बागी सांसदों ने ममता बनर्जी से नाता तोड़कर एक गुमनाम और छोटी सी पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में खुद को विलय कर लिया है. यह खबर भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे बड़े ‘शून्य से शिखर’ तक के सफर की कहानी भी लिख रही है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 14 जून 2026 की तारीख एक नए अध्याय की शुरुआत कर रही है. बागी गुट का नेतृत्व कर रही काकोली घोष ने रविवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर उन्हें 20 सांसदों के विलय का आधिकारिक पत्र सौंपा. बागी सांसदों ने सदन में तृणमूल कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है.
काकोली घोष ने हुंकार भरते हुए कहा, “हमारे पास दो-तिहाई सांसदों का समर्थन है, इसलिए दलबदल कानून हम पर लागू नहीं होगा. हम पीएम मोदी के नेतृत्व में NDA के साथ मिलकर देश के विकास के लिए काम करेंगे.” इस बागी गुट में सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय जैसे दिग्गज नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने इस महा-विलय की पुष्टि की है.
अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आई ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) का इतिहास बहुत ही दिलचस्प और चौंकाने वाला है. यह त्रिपुरा की एक पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है.
भले ही पार्टी त्रिपुरा से शुरू हुई, लेकिन इसका हेडक्वार्टर पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर में है. पार्टी के अध्यक्ष उत्तिय कुंडू हैं. खास बात यह है कि उत्तिय कुंडू का मौजूदा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर सामने आई है.
चुनाव आयोग के दस्तावेजों में शेली कुंडू (उत्तिय कुंडू की पत्नी) कोषाध्यक्ष हैं, लेकिन वे पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर भी कार्य करती हैं. पार्टी त्रिपुरा चुनाव के बाद से गायब हो गई थी. फंड की कमी के कारण संगठन ठप पड़ा था. लेकिन आज, किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि जो पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव तक नहीं लड़ी थी, अचानक उसके पास सांसदों के लिहाज से देश की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी बनने का मौका है.
सवाल उठता है कि टीएमसी के बागी सांसदों ने किसी बड़ी पार्टी के बजाय एनसीपीआई जैसी गुमनाम पार्टी को क्यों चुना? इसका जवाब तकनीकी दांवपेच में छिपा है. बागी सांसदों को अपनी सांसदी बचाने के लिए 2/3 बहुमत के साथ किसी अन्य पार्टी में ‘विलय’ (Merge) करना अनिवार्य था.
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चूंकि बागी सांसदों को तकनीकी तौर पर ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) एक क्षेत्रिय पार्टी है और पश्चिम बंगाल में पंजीकृत है, इसलिए इस अनजान ‘शेली कुंडू-उत्तिय कुंडू’ की पार्टी में विलय करना उनके लिए सबसे सुरक्षित दांव था. इस एक विलय ने एक गुमनाम पार्टी को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है और ममता बनर्जी की पार्टी के बिखराव को हमेशा के लिए मुहर लगा दी है.
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