Women Reservation Bill History India: महिला आरक्षण बिल का मुद्दा भारतीय राजनीति के उन चुनिंदा विषयों में से है, जिसने पिछले तीन दशकों में सबसे ज्यादा हंगामा, विरोध और हाई-वोल्टेज ड्रामा देखा है. दरअसल आज जब मोदी कैबिनेट ने इस बिल (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) को मंजूरी देकर संसद के पटल पर रखने की तैयारी की है, तो एक बार फिर वह पुरानी यादें ताजा हो गई हैं जब संसद के भीतर सांसदों के बीच हाथापाई तक की नौबत आ गई थी. यह कोई पहली या दूसरी बार नहीं है बल्कि इससे पहले 10 बार अलग-अलग सरकारों ने इस बिल को पास कराने की कोशिश की लेकिन हर बार यह किसी न किसी राजनैतिक अवरोध का शिकार होकर ‘लैप्स’ हो गया.
महिला आरक्षण की पहली आधिकारिक गूंज 1996 में सुनाई दी थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने इसे संसद के पटल पर रखा. उस समय इस क्रांतिकारी कदम की काफी चर्चा हुई, लेकिन विरोध के स्वर इतने तेज थे कि बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजना पड़ा.
इसके बाद 1997 में जब बिल दोबारा आया, तो मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे दिग्गज नेताओं ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. शरद यादव का वह बयान आज भी चर्चा में रहता है जब उन्होंने ‘कटी हुई चोटी वाली महिलाओं’ का जिक्र करते हुए ग्रामीण महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए थे.
आपको यह बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 1998 से 2003 के बीच कुल 6 बार इस बिल को पेश करने की कोशिश की. 13 जुलाई 1998 का दिन तो संसदीय इतिहास में काला दिन माना जाता है, जब आरजेडी सांसद सुरेंद्र यादव ने स्पीकर के सामने ही बिल की कॉपी फाड़ दी थी.
वहीं 2008 में मनमोहन सरकार के दौरान भी जबरदस्त विरोध हुआ लेकिन अंततः 9 मार्च 2010 को सोनिया गांधी की विशेष पहल पर इसे राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत से पास करा लिया गया. हालांकि, लोकसभा में यह फिर से अटक गया और 15वीं लोकसभा के भंग होते ही तकनीकी रूप से यह बिल खत्म (Lapse) हो गया.
कोटा के भीतर कोटा: क्षेत्रीय दलों (विशेषकर सपा और आरजेडी) की मांग रही है कि 33% आरक्षण के भीतर ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए भी अलग से आरक्षण तय हो, जिसके बिना वे इसका समर्थन करने को तैयार नहीं थे.
राजनैतिक इच्छाशक्ति और बहुमत: कई सरकारों ने बिल पेश तो किया, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों के चलते वे विरोध करने वाले अपने ही साथियों के आगे झुक गईं.
संवैधानिक पेच: अनुच्छेद 107 (5) के तहत लोकसभा भंग होते ही बिल लैप्स हो जाता है, जिसका खामियाजा इस विधेयक को बार-बार भुगतना पड़ा.
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2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में इसे पारित करने की दिशा में बड़ी सफलता मिली थी लेकिन अब 2026 के विशेष सत्र में परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाकर इसे जमीन पर उतारने की तैयारी है. मोदी सरकार पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि क्या इस बार वह पुरानी गलतियों को दरकिनार कर इस बिल को अंतिम रूप दे पाएगी. विपक्षी दल भले ही समर्थन की बात कर रहे हों, लेकिन सदन के भीतर होने वाली वोटिंग ही तय करेगी कि 30 साल से चला आ रहा यह वनवास अब खत्म होगा या नहीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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