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हाईकोर्ट पहुंचा दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव का मामला, उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्टिंग को चुनौती

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026-27 की पूरी प्रक्रिया और राजनीतिक दलों के कथित प्रभाव को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट 16 सितंबर को सुनवाई करेगा. यह याचिका ‘विजेता’ नामक याचिकाकर्ता की ओर से दायर की गई है. इसमें कई मुख्य बिंदू उठाए गए हैं.

शॉर्टलिस्टिंग और अधिसूचना को चुनौती

याचिका में 11 सितंबर 2026 को जारी उस आधिकारिक नोटिस को चुनौती दी गई है जिसके जरिए डूसू के विभिन्न पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) के लिए उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया है. इसके अलावा 13 अगस्त 2026 की मुख्य चुनाव अधिसूचना को भी खारिज करने की मांग की गई है.

राजनीतिक दलों का प्रभाव

याचिकाकर्ता का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया में विभिन्न राजनीतिक दलों और उनके अनुषांगिक छात्र संगठनों का सीधा हस्तक्षेप दिखाई दे रहा है. याचिका में एबीवीपी (BJP), एनएसयूआई (Congress), एसएफआई-एआईएसए गठबंधन और एएसएपी (AAP) जैसे छात्र संगठनों द्वारा उम्मीदवारों के पैनल घोषित किए जाने का विशेष रूप से हवाला दिया गया है. याचिकाकर्ता का दावा है कि राजनीतिक दलों द्वारा टिकट जारी करना और समर्थन देना लिंगदोह समिति की सिफारिशों के खिलाफ है.

डूसू संविधान के प्रावधानों को चुनौती

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि शॉर्टलिस्ट किए गए कुछ उम्मीदवारों की स्वीकार्यता चुनाव अधिसूचना में तय की गई शर्तों के अनुरूप नहीं है, इसके बावजूद चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ संविधान के क्लॉज 6(i) और 6(ii) को भी चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता के अनुसार, यह प्रावधान राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों को व्यवस्था में मान्यता देता है, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और लिंगदोह समिति की भावना से टकराता है.

लिंगदोह समिति की सिफारिशें

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों और लिंगदोह समिति (Lyngdoh Committee) की सिफारिशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि छात्रसंघ चुनाव पूरी तरह से राजनीतिक दलों के प्रभाव से मुक्त होने चाहिए. समिति ने चुनाव खर्च नियंत्रित करने, उम्मीदवारों की योग्यता तय करने और परिसर के शैक्षणिक माहौल को बनाए रखने के लिए सख्त निर्देश दिए थे.

याचिका में दावा किया गया है कि परिसरों में राजनीतिक दखल बढ़ने से छात्रों के बीच राजनीतिक आधार पर तनाव और मतभेद पैदा हो रहे हैं, जिसका सीधा असर अकादमिक माहौल पर पड़ रहा है. इसी आधार पर अदालत से तत्काल हस्तक्षेप करने और चुनाव प्रक्रिया में सुधार की मांग की गई है.

गोपाल कृष्ण

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