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Sawan 2025: पिहोवा के प्रथेस्वर महादेव मंदिर में होती है मनोकामना पूरी और मिलती है रोगों से मुक्ति

Sawan 2025: सावन के महीने में कुरुक्षेत्र के पिहोवा स्थित प्राचीन प्रथेस्वर महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. यह मंदिर सरस्वती नदी के तट पर स्थित है. कहा जाता है कि  प्रथेस्वर  महादेव मंदिर महाभारत कालीन है, इसका जिक्र पद्मपुराण में भी है. मान्यता है कि प्रथेस्वर मंदिर में पूजा अर्चना करने से मनोकामना पूरी होती है और रोगी व्यक्ति को रोगों से भी मुक्ति मिल जाती है.

जूना अखाड़ा करता है  प्राचीन प्रथेस्वर मंदिर की देखरेख

प्राचीन तीर्थनगरी पिहोवा में प्राचीन प्रथेस्वर महादेव मंदिर श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के साधु संतों की देख रेख में है. शिव मंदिर परिसर में सिद्ध नागा बाबा संतोष गिरि महाराज की समाधि भी है. श्रद्धालु शिव मंदिर में पूजा अर्चना के बाद नागा बाबा संतोष गिरि महाराज की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करते हैं. श्रद्धालुओं में उनके लिए अपार श्रद्धा भी है. समाधि दर्शन के लिए कुरुक्षेत्र और उसके आस पास के जिलों से काफी लोग आते हैं. मान्यता है कि समाधि दर्शन से जीवन की तमाम परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है.

प्रथेस्वर महादेव मंदिर की स्थापना चक्रवर्ती सम्राट पृथु ने की थी

श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के मंत्री एवं प्रथेस्वर महादेव मंदिर के महंत दीपेश्वर गिरी ने बताया कि प्रथेस्वर मंदिर की स्थापना महान चक्रवर्ती सम्राट पृथु ने की थी. राजा पृथु ने प्राचीन काल में पृथ्वी को अकाल से बचाया था और वह अपनी प्रजा का काफी ध्यान रखते थे. पुराणों में भी राजा पृथु के बनाए गए शिव मंदिर का प्रमाण मिलता है.

तीर्थनगरी पिहोवा में कई प्राचीन कथाएं हैं प्रचलित

पिहोवा एक प्राचीन तीर्थस्थल है, यह नगरी तमाम कथाओं से जुड़ी हुई है, जिनमें से सबसे ज्यादा वशिष्ट ब्रह्मऋषि और विश्वामित्र ब्रह्मऋषि के बीच युद्ध और सरस्वती नदी के श्राप की कथा  प्रचलित है. इस नगरी में असंख्य प्राचीन मंदिर हैं. यहां होने वाले यज्ञों और पूजा पाठ से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता रहता है जिसके कारण यह एक बड़ा तीर्थ स्थान कहलाता है.

महाराजा रणजीत सिंह ने कई प्राचीन मंदिरों का किया जीर्णोद्वार

तीर्थनगरी पिहोवा का इतिहास मुस्लिम आक्रमणों से भरा पड़ा है. आक्रांता महमूद गजनवी ने पिहोवा पर आक्रमण कर मंदिरों में खूब तोड़फोड़ की और धन संपदा को भी लूटा. मोहम्मद गौरी ने भी यहां खूब लूटपाट की और कई मंदिरों को तहस नहस कर डाला. औरंगजेब और उसकी सेना ने भी कई मंदिरों को निशाना बनाते हुए  उनको क्षतिग्रस्त व अपवित्र किया. 1739 में नादिर शाह ने इस शहर को अपना निशाना बनाया, मंदिर से जेवरात और पैसा लेकर गया. मराठा सरदार सदाशिव राव भाऊ ने पिहोवा को मुगलों और उसके सेनापतियों के अत्याचारों से मुक्त कराया. मुगल शासकों द्वारा मंदिरों में हुई तोड़फड से पिहोवा के मंदिर काफी क्षतिग्रस्त हो चुके थे. इन मंदिरों का जीर्णोद्वार महाराज रणजीत सिंह ने कराया जिससे इन मंदिरों को फिर से पुराना स्वरूप मिल सका.

तीर्थनगरी पिहोवा में आज भी मिल जाती हैं सरस्वती नदी के तट पर दुर्लभ मूर्तियां

मंदिर के महंत दीपेश्वर गिरी के मुताबिक आज भी सरस्वती नदी के तट स्थित मंदिरों के पास देवी देवताओं की दुर्लभ मूर्तियां मिलती रहती हैं. पिहोवा का शिव मंदिर महाभारत कालीन है लेकिन वर्तमान में दिखाई देने वाला मंदिर 8 वीं और 9वीं शताब्दी के बीच बना है.

दशनामी डेरा और टोपियों वाला मंदिर के रूप में है विख्यात

प्राचीन प्रथेस्वर महादेव मंदिर को टोपियों वाला मंदिर भी कहा जाता है और ये क्षेत्र में दशनामी डेरे के रूप में भी विख्यात है. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के संरक्षक एवं अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्री महंत हरिगिरि और वरिष्ठ सभापति श्रीमहंत प्रेमगिरि का भी वर्तमान में मंदिर के जीर्णोद्वार में महत्वपूर्ण योगदान है. प्रथेस्वर महादेव मंदिर में सावन के महीने में मंदिर के महंत नित्य रुद्राभिषेक और पूजा पाठ करवा रहे हैं.

भारतीय इतिहास संकलन समिति हरियाणा के मुताबिक पिहोवा के दशनामी डेरे में धर्मराज मंदिर में श्राद्धदेव जी की प्राचीन मूर्ति है.  मंदिर में श्राद्धेव जी के रूप में यमराज खुद उपस्थित रहते हैं. लोग यहां श्राद्ध कर्म, पिंडदान करते हैं जिससे पितरों को शांति और मुक्ति मिलती है.

–भारत एक्सप्रेस 

सुशील कुमार तिवारी

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