4 अगस्त 1956 का दिन भारत के वैज्ञानिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा. इसी दिन देश ने परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसा कदम उठाया, जिसने आने वाले दशकों में भारत की वैज्ञानिक दिशा तय कर दी. मुंबई के ट्रॉम्बे इलाके में बने भारत के पहले परमाणु अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ ने दोपहर 3 बजकर 45 मिनट पर सफलतापूर्वक काम करना शुरू किया. यह ना सिर्फ भारत का पहला परमाणु अनुसंधान रिएक्टर था, बल्कि एशिया का भी पहला ऐसा रिएक्टर था.
यह उपलब्धि उस समय हासिल हुई, जब भारत आजादी के कुछ ही साल बाद अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था. सीमित संसाधनों के बावजूद देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने दिखा दिया कि बड़े वैज्ञानिक सपनों को मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर पूरा किया जा सकता है.
भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने बहुत पहले ही समझ लिया था कि परमाणु क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए मजबूत शोध सुविधाओं की जरूरत होगी. उनका मानना था कि अनुसंधान रिएक्टर किसी भी परमाणु कार्यक्रम की नींव होते हैं.
इसी सोच के साथ उन्होंने ‘अप्सरा’ रिएक्टर की कल्पना की. यह एक स्विमिंग पूल प्रकार का रिएक्टर था, जिसमें पानी का इस्तेमाल सुरक्षा और संचालन के लिए किया जाता था. इसके लिए कुछ समृद्ध यूरेनियम ईंधन ब्रिटेन से मंगाया गया था, लेकिन रिएक्टर के निर्माण का बड़ा हिस्सा भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और संस्थानों ने मिलकर तैयार किया.
रिएक्टर को तैयार करने का काम तेजी से पूरा किया गया. 31 जुलाई 1956 को इसे शुरू करने की पहली कोशिश हुई, लेकिन तकनीकी समस्या के कारण सफलता नहीं मिली. इसके कुछ दिन बाद 4 अगस्त को आखिरकार वह ऐतिहासिक पल आया, जब ‘अप्सरा’ ने सफलतापूर्वक परमाणु विखंडन की श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू की. खास बात यह थी कि उस दिन मुंबई में तेज मानसूनी बारिश हो रही थी, लेकिन वैज्ञानिकों का हौसला नहीं डिगा.
‘अप्सरा’ को बिजली बनाने के लिए नहीं बनाया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु विज्ञान में शोध करना, नए वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण देना और रेडियोआइसोटोप्स तैयार करना था. इन आइसोटोप्स का इस्तेमाल बाद में चिकित्सा, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में होने लगा.
इस रिएक्टर के जरिए भारत ने न्यूट्रॉन भौतिकी, विकिरण सुरक्षा, सामग्री विज्ञान और परमाणु तकनीक के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को समझा. यही अनुभव आगे चलकर देश के बड़े परमाणु अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए आधार बना.
20 जनवरी 1957 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘अप्सरा’ को देश को समर्पित किया और इसका नाम रखा. स्विमिंग पूल डिजाइन वाले इस रिएक्टर के लिए ‘अप्सरा’ नाम पानी और सुंदरता से जुड़े भारतीय संदर्भ को ध्यान में रखते हुए चुना गया था.
‘अप्सरा’ की सफलता के बाद भारत ने परमाणु अनुसंधान के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ना शुरू किया. इसी अनुभव के आधार पर बाद में सीआईआरयूएस और ध्रुव जैसे बड़े अनुसंधान रिएक्टर विकसित किए गए.
रेडियोआइसोटोप्स के उत्पादन ने चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ा योगदान दिया. कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल आइसोटोप्स, कृषि अनुसंधान और औद्योगिक तकनीकों में इनका उपयोग बढ़ा.
साल 2009 में पुराने ‘अप्सरा’ रिएक्टर को बंद कर दिया गया, लेकिन इसकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. वर्ष 2018 में इसका उन्नत रूप ‘अप्सरा-यू’ फिर से शुरू किया गया. यह पहले से ज्यादा क्षमता वाला रिएक्टर है और भारत में मेडिकल आइसोटोप्स के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देता है.
आज, जब ‘अप्सरा’ की शुरुआत को 70 साल पूरे हो चुके हैं, यह सिर्फ एक वैज्ञानिक उपकरण नहीं बल्कि भारत की आत्मनिर्भर वैज्ञानिक सोच का प्रतीक बन चुका है. यह याद दिलाता है कि बड़े बदलाव केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, मेहनत और ज्ञान के प्रति समर्पण से आते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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