बारिश की पहले से भविष्यवाणी करने वाला कानपुर का ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर.
Kanpur Mysterious Temple: उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित भगवान जगन्नाथ का एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जो बारिश आने की सूचना मानसून से पहले ही दे देता है. वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों के तमाम प्रयासों के बावजूद, इस मंदिर की छत से पानी टपकने का रहस्य आज भी अनसुलझा है.
कानपुर जिले के भीतरगांव ब्लॉक स्थित बेहटा गांव का भगवान जगन्नाथ मंदिर अपनी अनोखी विशेषता के लिए जाना जाता है. मानसून आने से पहले मंदिर की छत के अंदरूनी हिस्से से पानी की बूंदें रिपने लगती हैं, जिसे स्थानीय लोग बारिश का पूर्व संकेत मानते हैं. पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार इस मंदिर का आखिरी जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था, लेकिन इसके निर्माण और पानी टपकने के सटीक कारण का पता आज तक नहीं चल सका है. इसके पास ही 5वीं-6वीं सदी का प्रसिद्ध गुप्तकालीन ईंटों का मंदिर भी मौजूद है, जो अपनी टेराकोटा कारीगरी के लिए विश्वविख्यात है.
यह मंदिर भगवान जगन्नाथ को समर्पित है और कानपुर जिले के भीतरगांव ब्लॉक मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर बेहटा गांव में स्थित है. स्थानीय लोगों के बीच मान्यता है कि जैसे ही बारिश का समय नजदीक आता है, मंदिर की छत के अंदर से पानी की छोटी-छोटी बूंदें दिखाई देने लगती हैं. बूंदों का टपकना लोगों के लिए आने वाली बारिश का संकेत माना जाता है.
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? क्या मंदिर की बनावट में कोई ऐसी खासियत है, जो मौसम में होने वाले बदलाव को पहले ही महसूस कर लेती है? या फिर इसके पीछे कोई प्राकृतिक प्रक्रिया है? इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश कई बार की गई, लेकिन आज तक इस रहस्य पर पूरी तरह से पर्दा नहीं उठ पाया है.
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पुरातत्व विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने भी मंदिर से जुड़ी कई जांच और सर्वे किए हैं. इसके बावजूद मंदिर के निर्माण का सही समय और छत से बारिश से पहले पानी टपकने की घटना का सटीक कारण स्पष्ट नहीं हो सका. इतना जरूर माना जाता है कि मंदिर का आखिरी बड़ा जीर्णोद्धार 11वीं सदी के आसपास हुआ था.
इसके अलावा, कानपुर नगर के भीतरगांव में भारत का सबसे पुराना ईंटों से बना मंदिर मौजूद है, जो गुप्त काल का है. 5वीं-6वीं सदी के आसपास बना यह शानदार मंदिर अपने टेराकोटा पैनल और ईंटों की बारीक कारीगरी के लिए जाना जाता है. भीतरगांव का प्राचीन ईंटों वाला मंदिर सिर्फ एक स्मारक ही नहीं, बल्कि भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास का एक अहम अध्याय भी है.
-भारत एक्सप्रेस
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