विश्लेषण

न्यूयॉर्क से लंदन तक: कैसे मोहन भागवत पश्चिमी देशों तक पहुंचा रहे हैं RSS का सभ्यतागत संदेश

Mohan Bhagwat London Visit: मोहन भागवत का न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन का दौरा केवल प्रवासी भारतीयों से मिलने तक सीमित नहीं माना जा रहा है. इसे RSS के उस प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिसके जरिए वह सेवा, सामाजिक समरसता, विविधता में एकता और वसुधैव कुटुंबकम जैसे विचारों को वैश्विक मंच पर पहुंचाना चाहता है.

RSS के शताब्दी वर्ष के दौरान होने वाला लंदन दौरा इस संदेश को ऐसे शहर में ले जा रहा है, जहां भारतीय पहचान, विभिन्न धर्मों के बीच संवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पहले से ही सामुदायिक चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

पश्चिम में कौन-सा सभ्यतागत संदेश लेकर जा रहा है RSS?

RSS पश्चिमी देशों में एक सभ्यतागत संदेश लेकर जा रहा है. वह भारत को केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि साझा इतिहास, पारंपरिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और आध्यात्मिक विविधता से बनी एक सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करता है.

इस सोच के तहत RSS की विचारधारा को विदेशों में केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के लिए जुड़ाव, सेवा, अनुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की भाषा के रूप में पेश किया जा रहा है.

यह अंतर महत्वपूर्ण है. किसी संगठन को फैलाने का मतलब उसके कार्यालय, ढांचे और कामकाज की शैली को दोहराना होता है. जबकि किसी सभ्यतागत सोच को आगे बढ़ाने का मतलब लोगों को धर्म, परिवार, सेवा, राष्ट्रीय एकता और वैश्विक जिम्मेदारी के नजरिए से अपनी पहचान समझने के लिए प्रेरित करना है.

जोर इस बात पर है कि लोग खुद को कैसे देखते हैं, जिस समाज में रहते हैं उससे कैसे जुड़ते हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक जीवन से कैसे जोड़ते हैं.

यही कारण है कि “सभ्यतागत संवाद” और “सेलिब्रेशन ऑफ ऑननेस” जैसे विषय लंदन कार्यक्रम के केंद्र में हैं. इनके जरिए समर्थक RSS के संदेश को राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक समरसता, सेवा, विविधता में एकता और “वसुधैव कुटुंबकम” यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, जैसे विचारों पर आधारित है.

लंदन में यह संदेश सामुदायिक स्वरूप ले रहा है

लंदन का दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैश्विक स्तर के प्रतीकात्मक संपर्क को एक संगठित प्रवासी भारतीय समाज के बीच ले जाता है.

रिपोर्टों और आयोजकों के अनुसार, मोहन भागवत के लंदन कार्यक्रम का आयोजन हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) यूके कर रहा है. वहीं “इंटीग्रल” नामक संस्था इस दौरे के समन्वय का काम कर रही है. यह मंच सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों, सामुदायिक नेताओं और विभिन्न समूहों को संवाद और सहयोग के लिए एक साथ ला रहा है.

लंदन कार्यक्रम में करीब 500 सामुदायिक नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है. साथ ही 115 से अधिक संगठनों का सहयोग और भागीदारी भी बताई जा रही है.

इससे कार्यक्रम केवल एक व्यक्ति के भाषण तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह मंदिरों, सांस्कृतिक संगठनों, पेशेवर समूहों और सामाजिक संस्थाओं का एक बड़ा मंच बन जाता है, जो यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आज के ब्रिटेन में भारतीय विरासत का क्या अर्थ है.

समर्थकों के लिए यह वह जगह है जहां सांस्कृतिक राष्ट्रवाद केवल विचार नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप लेता है. सवाल यह है कि क्या प्रवासी भारतीय अपनी भाषा, परंपराएं, पारिवारिक मूल्य और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए ब्रिटिश समाज में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं?

इसका जवाब आयोजकों की ओर से “हां” में दिया जा रहा है. उनका कहना है कि यह समाज से अलग होने का नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं के साथ समाज में सक्रिय भागीदारी का संदेश है.

विभिन्न धर्मों के बीच संवाद पर भी जोर

ब्रिटेन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को बढ़ावा देना भी है.

मोहन भागवत ने विल्सडेन स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर और खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारे का दौरा किया है. इसके अलावा एक जैन मंदिर की यात्रा भी कार्यक्रम का हिस्सा बताई गई है.

इन यात्राओं के जरिए दौरे को केवल समुदाय आधारित कार्यक्रम के बजाय संवाद और सहभागिता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.

ब्रिटेन जैसे देश में, जहां धार्मिक संस्थाएं सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, मंदिर और गुरुद्वारे के दौरे का एक सामाजिक और सार्वजनिक महत्व भी है.

यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि हिंदू, सिख और जैन परंपराओं को साझा सांस्कृतिक विरासत, सह-अस्तित्व और सेवा की भावना के साथ देखा जा सकता है.

हालांकि इससे RSS को लेकर चल रही बहस खत्म नहीं होती. अमेरिका और ब्रिटेन में कुछ आलोचकों ने RSS की राजनीतिक संबद्धताओं और हिंदुत्व की विचारधारा को लेकर सवाल उठाए हैं. वहीं समर्थकों का कहना है कि शताब्दी वर्ष का यह अभियान पहचान, सेवा और संवाद पर केंद्रित है.

यही वजह है कि लंदन दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यहां RSS की विचारधारा ऐसे सार्वजनिक मंच पर चर्चा का विषय बन रही है, जहां समर्थन, आलोचना और जांच—तीनों मौजूद हैं.

न्यूयॉर्क से लंदन तक का सफर क्यों महत्वपूर्ण है?

न्यूयॉर्क से लंदन तक का यह सफर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय से जुड़ने की RSS की कोशिश को दिखाता है.

न्यूयॉर्क अमेरिका के बड़े सार्वजनिक मंच का प्रतिनिधित्व करता है, टोरंटो कनाडा के विशाल भारतीय समुदाय से जुड़ाव का अवसर देता है और लंदन भारतीय मूल के लोगों की ऐतिहासिक उपस्थिति वाले ब्रिटिश समाज में इस संदेश को पहुंचाता है.

इन तीनों शहरों के जरिए RSS का सभ्यतागत संदेश केवल भारत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक वैश्विक संवाद का हिस्सा बन जाता है.

यह भी दिखाता है कि सांस्कृतिक संगठन नई पीढ़ी के प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने के लिए नए तरीके अपना रहे हैं.

दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय केवल भूगोल के आधार पर अपनी पहचान नहीं बनाते. वे त्योहारों, पारिवारिक कहानियों, डिजिटल मीडिया, सामुदायिक संस्थाओं, राजनीतिक बहसों और सामाजिक अनुभवों के जरिए अपनी पहचान को समझते हैं.

ऐसे में भारतीय पहचान पर आधारित कोई भी संदेश यह समझाने की कोशिश करता है कि लोग कहां से आए हैं और जहां रहते हैं वहां अपनेपन की भावना कैसे विकसित कर सकते हैं.

RSS का पश्चिमी देशों में यह अभियान केवल पुरानी यादों तक सीमित नहीं है. इसका उद्देश्य प्रवासी भारतीयों के बीच निरंतरता, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना भी है.

चाहे कोई RSS की विचारधारा से सहमत हो या असहमत, यह स्पष्ट है कि सभ्यतागत भाषा और सांस्कृतिक पहचान आधुनिक प्रवासी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है.

इस अभियान के प्रमुख विचार

लंदन कार्यक्रम में कुछ विचार बार-बार सामने आते हैं. इन्हीं के जरिए RSS अपने संदेश को दुनिया तक पहुंचाना चाहता है.

  • सामाजिक समरसता: समुदायों को आंतरिक विभाजनों से ऊपर उठकर आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जाता है.
  • सेवा: सेवा को केवल नैतिक उपदेश नहीं बल्कि जीवन में मूल्यों को लागू करने का व्यावहारिक तरीका बताया जाता है.
  • विविधता में एकता: उद्देश्य अलग-अलग भारतीय परंपराओं को साथ लाना है, बिना उन्हें एक जैसा बनाए.
  • राष्ट्रीय एकीकरण: भारतीय पहचान को केवल नागरिकता नहीं, बल्कि सभ्यतागत जुड़ाव के रूप में भी देखा जाता है.
  • पारंपरिक मूल्य: परिवार, अनुशासन, कर्तव्य और सांस्कृतिक निरंतरता को आधुनिक जीवन के लिए उपयोगी माना जाता है.
  • वसुधैव कुटुंबकम: पूरी दुनिया को एक परिवार मानने का विचार इस अभियान को एक वैश्विक और सार्वभौमिक भाषा देता है.

ये सभी विषय पश्चिमी देशों में इस संदेश को समझाने में मदद करते हैं. सामुदायिक नेता, धार्मिक संस्थाएं और सामाजिक संगठन सेवा, समरसता, जुड़ाव और योगदान जैसे विचारों से आसानी से जुड़ सकते हैं.

संगठन से आगे का संदेश

इस दौरे की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे केवल विदेशों में RSS का विस्तार करने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जा रहा.

इसके जरिए एक ऐसी सभ्यतागत भाषा को वैश्विक मंच पर ले जाने की कोशिश की जा रही है, जो भारत, हिंदू समाज, प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को 21वीं सदी के संदर्भ में समझाती है.

कुछ लोग इस सोच का स्वागत करेंगे, तो कुछ इसके प्रति सवाल भी उठाएंगे. लेकिन न्यूयॉर्क से लंदन तक यह संदेश पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रहा है.

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इस अभियान की असली परीक्षा इस बात में होगी कि सामाजिक समरसता और विविधता में एकता का संदेश कितना खुला, सकारात्मक और व्यवहारिक बना रहता है. खासकर उन बहुलतावादी समाजों में, जहां आज यह संदेश लोगों तक पहुंचाया जा रहा है.

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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