आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ब्रिटेन (UK) दौरा केवल प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है; यह इस बात की एक सार्वजनिक परीक्षा बन चुका है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पश्चिमी देशों के सामने हिंदुत्व, भारत और संघ की अवधारणा को किस तरह समझाता है. 2 से 7 सितंबर 2026 तक लंदन में आयोजित यह दौरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान हो रहा है. आयोजकों ने इसे जनसंपर्क, संवाद और हिंदुत्व को लेकर फैली गलतफहमियों को दूर करने की एक कोशिश बताया है.
समर्थकों के लिए यह दौरा हिंदुत्व को सांस्कृतिक आत्मविश्वास और समाज सेवा में रची-बसी एक सभ्यतागत सोच के रूप में पेश करने का अवसर है. वहीं आलोचकों के लिए यह बहुसंख्यकवादी राजनीति, अल्पसंख्यक अधिकारों और वैश्विक स्तर पर संघ के प्रभाव से जुड़ी चिंताओं को जन्म देता है. इस दौरे को समझने के लिए संघ के अपने पक्ष और पश्चिमी जगत में जारी बहस को तय करने वाली चिंताओं, दोनों को समझना जरूरी है.
मोहन भागवत के इस दौरे पर ध्यान इसलिए आकर्षित हुआ है क्योंकि वे भारत के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक, आरएसएस के सरसंघचालक हैं, और भारत से बाहर हिंदुत्व की विचारधारा पर अक्सर तीखी बहसें होती रही हैं.
आरएसएस के दस्तावेजों के अनुसार, यह लंदन दौरा उसके शताब्दी वर्ष से जुड़े विदेशी संवाद अभियान का हिस्सा है. इसे ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ यूके’ की पहल पर आयोजित किया गया है, जो 1966 में ब्रिटेन में स्थापित एक हिंदू सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है. इस दौरे का समय भी महत्वपूर्ण है. पश्चिमी मीडिया, अकादमिक जगत और एक्टिविस्ट समूह अक्सर राष्ट्रवाद, धर्म, अल्पसंख्यक पहचान और भारतीय राजनीति के नजरिए से हिंदुत्व पर चर्चा करते हैं.
दूसरी ओर, आरएसएस आमतौर पर खुद को चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय सेवा और सामाजिक समरसता पर केंद्रित एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है. संघ के अपने विवरण और बाहरी आलोचना के बीच का यही अंतर हिंदुत्व को लेकर कई गलतफहमियों का कारण बनता है.
ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने इस दौरे को सामुदायिक प्रतिनिधित्व के एक बड़े अवसर के रूप में देखा है. रिपोर्टों के अनुसार, 100 से अधिक ब्रिटिश हिंदू और सामाजिक संगठनों ने यूके पहुंचने पर भागवत का स्वागत किया, जबकि कुछ अन्य नागरिक समाज संगठनों ने सरकारी अधिकारियों से इस कार्यक्रम से दूरी बनाने की मांग की.
इस मुद्दे पर बहस के गर्माने की एक बड़ी वजह यह है कि लोग हिंदुत्व को किसी एक तय नजरिए से नहीं देखते. संघ की शब्दावली में, हिंदुत्व को केवल एक संकीर्ण धार्मिक पहचान के बजाय अक्सर भारत की सभ्यतागत निरंतरता से जुड़ी एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान के रूप में पेश किया जाता है. आरएसएस के बयानों में ‘हिंदू’ शब्द को सभ्यता के संदर्भ में परिभाषित किया गया है, जिसमें वे लोग भी शामिल हैं जो भारत के इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान करते हैं, भले ही उनकी पूजा पद्धतियां या धार्मिक परंपराएं अलग हों.
हालांकि, आलोचक अक्सर हिंदुत्व को एक ऐसे राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में देखते हैं जो भारत के सार्वजनिक जीवन में हिंदू पहचान को प्राथमिकता देता है. यह व्याख्या पश्चिमी टिप्पणियों और उन मानवाधिकार व पैरोकार समूहों में आम है जो आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों को सामाजिक ध्रुवीकरण की चिंताओं से जोड़ते हैं.
भागवत के उत्तरी अमेरिका और यूके के दौरों के दौरान, कुछ विरोधियों ने इस दौरे को विदेशों में हिंदू राष्ट्रवाद को सामान्य रूप देने (normalize करने) की कोशिश करार दिया. दोनों पक्ष एक ही शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दोनों का अर्थ अक्सर अलग होता है. समर्थक ‘हिंदुत्व’ में सांस्कृतिक अस्मिता, निरंतरता और जिम्मेदारी देखते हैं.
वहीं आलोचक इसे एक ऐसी बहुसंख्यकवादी विचारधारा के रूप में देखते हैं जो गैर-हिंदू समुदायों को हाशिए पर धकेल सकती है. हिंदुत्व की विचारधारा पर किसी भी गंभीर चर्चा के लिए यह समझना जरूरी है कि यह विवाद भाषा के अर्थों के साथ-साथ वास्तविक राजनीतिक अनुभवों से भी जुड़ा है.
इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है: हिंदुत्व का इतिहास आज के राजनीतिक विवादों से पुराना है और यह व्याख्या के कई चरणों से होकर गुजरा है. विनायक दामोदर सावरकर की 1923 की रचना, जिसे आमतौर पर ‘एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व’ के नाम से जाना जाता है, इस अवधारणा का आधुनिक आधारभूत ग्रंथ मानी जाती है. वहीं आरएसएस की स्थापना 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी.
आरएसएस अपनी उत्पत्ति के इतिहास में हिंदू समाज के संगठन, अनुशासन, देशभक्ति और सामाजिक एकता पर बल देता है. संघ के अपने ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी और यह शाखाओं, स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण तथा सामाजिक पहलों के माध्यम से आगे बढ़ा. यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी देशों के सामने आरएसएस की छवि अक्सर उसके लंबे संगठनात्मक सफर के बजाय वर्तमान की सुर्खियों से बनती है.
इसके साथ ही, आलोचकों का तर्क है कि ऐतिहासिक जड़ों को आज के राजनीतिक परिणामों से अलग करके नहीं देखा जा सकता. इसलिए यह यूके दौरा केवल चीजों को समझाने का मंच नहीं, बल्कि एक कड़ी समीक्षा की कसौटी भी बन जाता है.
भागवत के दौरे से जुड़े जनसंपर्क का घोषित उद्देश्य केवल औपचारिक नहीं है. इसका उद्देश्य संवाद स्थापित करना है: यह समझाना कि संघ भारत, हिंदू पहचान और वैश्विक हिंदू सहभागिता को किस रूप में देखता है. आरएसएस के प्रतिनिधियों का कहना है कि संवाद से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि संगठन के भीतर हिंदुत्व को कैसे समझा जाता है, जिसमें यह दावा भी शामिल है कि इसमें विभिन्न धार्मिक परंपराओं का सम्मान समाहित है.
हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म: हिंदू धर्म आमतौर पर धार्मिक परंपराओं, अनुष्ठानों, दर्शन और पूजा पद्धतियों को दर्शाता है. संघ के संदर्भ में हिंदुत्व का अर्थ सांस्कृतिक और सभ्यतागत जुड़ाव से अधिक है.
भारत बनाम इंडिया: आरएसएस के विचारकों के लिए ‘भारत’ शब्द आधुनिक राष्ट्र-राज्य के बजाय सभ्यतागत स्मृति और निरंतरता का प्रतीक है.
आरएसएस बनाम राजनीतिक दल: आरएसएस खुद को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताता है, हालांकि विश्लेषक और आलोचक उसके व्यापक संघ परिवार नेटवर्क के कारण भारतीय राजनीति पर उसके प्रभाव की चर्चा करते हैं.
प्रवासी गतिविधियां बनाम घरेलू राजनीति: हिंदू स्वयंसेवक संघ और विदेशों में सक्रिय ऐसे संगठन अपने काम को संस्कृति, युवा शिक्षा और सामुदायिक सेवा से जोड़ते हैं, जबकि आलोचक इनके वैचारिक संबंधों की पड़ताल करते हैं.
एकता बनाम अलगाव: समर्थक संघ को सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देने वाले मंच के रूप में देखते हैं; आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि क्या यह एकजुटता भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता के लिए पर्याप्त जगह छोड़ती है.
मुख्य सवाल यह नहीं है कि किसी एक दौरे से सारे मतभेद खत्म हो जाएंगे या नहीं. सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक संवाद अधिक सटीक, नारों से परे और दोनों पक्षों के वास्तविक दावों पर आधारित हो सकता है.
ब्रिटेन में भारतीय मूल की एक बड़ी और विविधतापूर्ण आबादी रहती है, जहाँ हिंदू सामुदायिक संगठन सांस्कृतिक शिक्षा, त्योहारों, युवा गतिविधियों और सार्वजनिक प्रतिनिधित्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस संदर्भ में, कई समर्थक भागवत के दौरे को ब्रिटिश हिंदू समुदाय के आत्मविश्वास और परिपक्वता की पहचान के रूप में देख रहे हैं. लेकिन ब्रिटेन में होने के कारण यह चर्चा एक ऐसे बहुसांस्कृतिक लोकतांत्रिक देश में हो रही है जिसकी नस्ल, धर्म, आव्रजन (इमिग्रेशन) और अंतर-सामुदायिक संबंधों को लेकर अपनी संवेदनशीलताएं हैं.
दौरे का विरोध करने वाले समूहों ने आरएसएस, हिंदुत्व और ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई समुदायों के बीच पहले रहे तनावों को लेकर चिंताएं जताई हैं. यह पहलू इस दौरे को प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण बनाता है. यह केवल इस बारे में नहीं है कि आरएसएस विदेशों में रह रहे हिंदुओं से क्या कहता है; बल्कि यह इस बारे में भी है कि गैर-हिंदू पड़ोसियों, नीति-निर्माताओं, पत्रकारों और युवा ब्रिटिश भारतीयों तक हिंदू पहचान का क्या संदेश पहुंचता है, जिनकी संघ को लेकर मिली-जुली राय हो सकती है.
यदि मोहन भागवत के यूके दौरे का उद्देश्य पश्चिमी देशों में फैली गलतफहमियों को दूर करना है, तो सबसे सही तरीका रक्षात्मक होने के बजाय धैर्यपूर्वक अपनी बात रखना है. श्रोताओं को स्पष्ट परिभाषाओं, ऐतिहासिक संदर्भों और कठिन सवालों पर खुले संवाद की आवश्यकता है. वे यह समझना चाहते हैं कि व्यापक सांस्कृतिक दावे अल्पसंख्यकों, असहमति रखने वालों और बहुलतावादी परंपराओं के प्रति वास्तविक सम्मान में कैसे बदलते हैं. इस दौरे को निष्पक्ष रूप से समझने के लिए कुछ व्यावहारिक बातों पर ध्यान देना उपयोगी होगा.
शब्दों को आंकने से पहले उनके अर्थ अलग करें: हिंदू धर्म, हिंदुत्व, भारत, आरएसएस और संघ एक-दूसरे से जुड़े तो हैं, लेकिन पूरी तरह एक समान नहीं हैं.
मूल दावों और विश्वसनीय आलोचना दोनों को पढ़ें: केवल एक पक्ष को समझने से तस्वीर या तो अति-उत्साही बनेगी या फिर केवल नकारात्मक.
सिर्फ भाषा नहीं, आचरण को भी देखें: समाज सेवा, सार्वजनिक भाषण, राजनीतिक प्रभाव और सामुदायिक संबंध, ये सभी मायने रखते हैं.
प्रवासी भारतीयों को एक ही राय वाला न समझें: भारत की तरह ही ब्रिटिश हिंदुओं के बीच भी आरएसएस को लेकर अलग-अलग विचार हैं.
परखें कि व्यवहार में समावेशिता का क्या अर्थ है: किसी भी सभ्यतागत विचार की सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि वह अपने से असहमत लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है.
मोहन भागवत का यूके दौरा हिंदुत्व के इतिहास, प्रवासी अस्मिता और दुनिया में भारत के स्थान को लेकर जारी वैश्विक बहसों के केंद्र में स्थित है. आरएसएस और उसके समर्थकों के लिए यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर संघ के दृष्टिकोण को समझाने और पश्चिम में हिंदुत्व से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करने का एक अवसर है. वहीं आलोचकों के लिए यह भारत के बाहर हिंदुत्व की विचारधारा के प्रभावों पर सवाल उठाने का समय है.
यह दौरा शायद इस पूरी बहस को समाप्त न कर सके, लेकिन इसे अधिक स्पष्ट जरूर बना सकता है. यदि इससे स्पष्ट परिभाषाएं, खुला संवाद और कठिन सवालों पर सीधे बातचीत का रास्ता खुलता है, तो यह किसी संगठन के प्रचार से कहीं बड़ा काम कर सकता है. यह दुनिया को यह समझने में मदद कर सकता है कि आरएसएस, हिंदुत्व, भारत और संघ जैसे शब्द भारत और दुनिया भर में बसे भारतीय समुदाय के बीच आज भी इतना गहरा प्रभाव क्यों रखते हैं.
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