विजयदशमी का त्योहार हमें हर साल याद दिलाता है कि आखिरकार जीत सत्य की होती है, झूठ की नहीं. अच्छाई बुराई पर भारी पड़ती है और धर्म अधर्म को हराता है. लेकिन आज के डिजिटल दौर में इस संदेश को समझने का नजरिया भी बदलने लगा है. अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सच और झूठ में कौन जीतेगा, बल्कि यह भी है कि लोगों तक कौन-सी बात पहुँचेगी और कौन-सी बात पीछे छूट जाएगी.
आज हमारी सुबह मोबाइल की स्क्रीन से शुरू होती है और रात भी अक्सर उसी को देखते हुए खत्म होती है. खबरें पढ़नी हों, मनोरंजन करना हो, खरीदारी करनी हो या दुनिया में क्या चल रहा है, यह जानना हो हमारी काफी जरूरतें कुछ बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पूरी होती हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इन प्लेटफॉर्म पर दिखाई देने वाली हर चीज अपने आप सबसे सही, जरूरी या भरोसेमंद नहीं हो जाती.
Google, YouTube, Instagram, Facebook और X जैसे प्लेटफॉर्म पर हर दिन करोड़ों लोग अलग-अलग तरह की सामग्री देखते हैं. यहां कौन-सी पोस्ट ज्यादा दिखाई देगी, कौन-सा वीडियो लोगों तक पहुँचेगा और कौन-सी खबर चर्चा में आएगी, इसमें एल्गोरिदम की बड़ी भूमिका होती है.
इन प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम आमतौर पर यह समझने की कोशिश करते हैं कि लोग किस सामग्री पर ज्यादा समय बिताते हैं, किसे पसंद करते हैं और किसे दूसरों के साथ साझा करते हैं. इसका फायदा यह है कि लोगों को उनकी पसंद से जुड़ी सामग्री आसानी से मिल जाती है. लेकिन इसके साथ एक परेशानी भी है.
कई बार सनसनीखेज खबरें, भड़काऊ बयान और भावनाओं को उकसाने वाली पोस्ट तेजी से फैलती हैं, जबकि किसी मुद्दे की गहराई से पड़ताल करने वाली रिपोर्ट उतना ध्यान नहीं खींच पाती. नतीजा यह होता है कि लोगों के सामने किसी विषय का एक ही पहलू बार-बार आता है. धीरे-धीरे वे दूसरे विचारों और तथ्यों से दूर होने लगते हैं.
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर किसी बात का वायरल होना और उसका सच होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
डिजिटल दुनिया में कंपनियां सिर्फ अपने उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं हैं. वे लोगों की ऑनलाइन गतिविधियों और रुचियों से जुड़ी जानकारी के आधार पर अपने विज्ञापन दिखाने की कोशिश करती हैं. आपने किसी चीज के बारे में इंटरनेट पर खोज की और कुछ समय बाद उसी से जुड़े विज्ञापन अलग-अलग ऐप पर दिखाई देने लगे, तो यह इसी व्यवस्था का एक उदाहरण हो सकता है.
इस तरह की तकनीक से ग्राहकों को उनकी जरूरत के मुताबिक उत्पाद खोजने में मदद मिलती है. मगर सवाल यह भी है कि बार-बार एक ही चीज दिखाई जाने पर हमारी पसंद कितनी स्वतंत्र रह जाती है.
जब किसी ब्रांड या उत्पाद का प्रचार लगातार सामने आता है, तो वह हमें दूसरे विकल्पों से ज्यादा आकर्षक लग सकता है. जरूरी नहीं कि हम पर कोई सीधा दबाव बनाया जाए, लेकिन हमारी पसंद और खरीदारी के फैसले प्रभावित हो सकते हैं.
आज स्मार्टफोन की दुनिया में Android और iOS जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम की अहम भूमिका है. वहीं कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों के लिए Windows एक बड़ा नाम है. ऐप स्टोर, सर्च इंजन, ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल सेवाओं के जरिए भी बड़ी कंपनियों का प्रभाव दिखाई देता है.
इन सुविधाओं ने हमारी जिंदगी को आसान बनाया है. कुछ ही सेकंड में हम बैंकिंग कर सकते हैं, टिकट बुक कर सकते हैं और दुनिया के किसी भी कोने की खबर जान सकते हैं. लेकिन जब रोजमर्रा की जरूरतें कुछ चुनिंदा कंपनियों की सेवाओं पर निर्भर होने लगती हैं, तो विकल्पों और प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
एक आम यूजर के लिए यह समझना भी आसान नहीं होता कि उसका डेटा कहां इस्तेमाल हो रहा है और किसी खास सामग्री को उसकी स्क्रीन पर दिखाने के पीछे क्या वजह है.
इंटरनेट ने आम लोगों को भी अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने का मौका दिया है. छोटे कारोबारियों से लेकर स्वतंत्र पत्रकारों और नए कंटेंट क्रिएटर्स तक, लाखों लोग इसका फायदा उठा रहे हैं. लेकिन ऑनलाइन मौजूद होना और लोगों तक अपनी बात पहुँचा पाना, दोनों में फर्क है.
किसी पोस्ट की पहुंच प्लेटफॉर्म की नीतियों, दर्शकों की प्रतिक्रिया और एल्गोरिदम जैसे कई कारणों से प्रभावित हो सकती है. कभी किसी सामग्री को कम लोगों तक दिखाया जाता है, तो कभी विज्ञापन से कमाई करने के अवसर सीमित हो जाते हैं. दूसरी ओर, प्रचार पर पैसा खर्च करने से पोस्ट की पहुंच बढ़ाने का विकल्प भी मिलता है.
इससे एक अहम सवाल पैदा होता है: क्या इंटरनेट पर किसी विचार की सफलता उसकी गुणवत्ता से तय होती है या इस बात से भी कि उसे ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए कितने संसाधन उपलब्ध हैं?
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने छोटे रचनाकारों को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचने का अवसर दिया है. Mastodon और Bluesky जैसे वैकल्पिक सोशल प्लेटफॉर्म भी मौजूद हैं. साथ ही, डेटा की सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और ऑनलाइन सामग्री के नियमों को लेकर कई देशों में चर्चा और नियामकीय प्रयास जारी हैं.
ऐसे माहौल में सिर्फ डिजिटल कंपनियों को जिम्मेदार ठहराना काफी नहीं होगा. इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को भी अपनी आदतों में कुछ बदलाव करने होंगे.
सबसे पहले, किसी खबर को आगे भेजने से पहले उसकी पुष्टि करना जरूरी है. केवल आकर्षक हेडलाइन देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरी खबर पढ़ें और देखें कि दूसरे भरोसेमंद स्रोत उस बारे में क्या बता रहे हैं. किसी एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहने के बजाय अखबारों, स्वतंत्र समाचार वेबसाइटों, किताबों और अलग-अलग नजरिए वाले स्रोतों से भी जानकारी लें.
इसके अलावा, अपनी ऑनलाइन प्राइवेसी का ध्यान रखना, ऐप की अनुमतियों को समझना और जरूरत के मुताबिक वैकल्पिक डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करना भी उपयोगी हो सकता है. कंटेंट बनाने वालों के लिए भी जरूरी है कि वे अपनी पूरी पहुंच किसी एक प्लेटफॉर्म के भरोसे न छोड़ें और अपनी वेबसाइट या अन्य माध्यमों से पाठकों से सीधा जुड़ाव बनाए रखें.
विजयदशमी हमें यह नहीं सिखाती कि बुराई हमेशा कमजोर होती है. कई बार गलत बात आकर्षक लगती है, झूठ सच से ज्यादा तेजी से फैलता है और ताकतवर आवाजों के बीच सही बात सुनाई देना मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सच की अहमियत खत्म हो गई है.
डिजिटल युग में रावण के दस सिर की कोई नई तकनीकी तस्वीर तलाशने से ज्यादा जरूरी है उन तरीकों को समझना, जिनसे हमारी सोच और सूचना तक पहुंच प्रभावित होती है. आज सत्य की जीत के लिए सिर्फ अच्छी नीयत काफी नहीं है. सही जानकारी, सवाल पूछने की आदत, अलग-अलग विचारों को सुनने का धैर्य और तकनीक के प्रति जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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