ब्लॉग

कुर्बानी: सिर्फ रिवायत नहीं, आर्थिक क्रांति, सेवा और साझेदारी का प्रतीक — शाहिद सईद

नई दिल्ली, 6 जून 2025 — शनिवार को ईद-उल-अज़हा है, जिसे आम बोलचाल में बकरीद के नाम से जाना जाता है. भारतीय समाज में यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं रह गई है, बल्कि यह आज के समय में आर्थिक सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और साझेदारी के नए प्रतिमान स्थापित करने वाला पर्व बन चुका है. यह त्योहार इस्लामी आस्था की नींव पर खड़ा ज़रूर है, लेकिन इसकी जड़ें भारत की मिट्टी में समरसता, सह-अस्तित्व और सहयोग की भावना से सींची जाती हैं. बकरीद हमें सिखाता है कि इबादत सिर्फ इबादतगाहों में नहीं होती, बल्कि जब हमारी नीयत सेवा, समानता और इंसानियत की ओर झुकती है, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन आता है.

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संपूर्ण आर्थिक चक्र सक्रिय होता है, जो भारत की ग्रामीण से लेकर शहरी अर्थव्यवस्था तक को गति देता है. बकरीद के दौरान देशभर में पशुपालन, वस्त्र उद्योग, इत्र, मिठाई, ड्राई फ्रूट, मसाले, टेंट-किचन सामग्री, बर्फ, सजावटी वस्तुएँ, क्रॉकरी, जूते-चप्पल, गिफ्ट पैकिंग आदि सैकड़ों क्षेत्रों में तेज़ी आती है. लाखों करोड़ रुपये का कारोबार इन दिनों होता है, जिससे न केवल असंगठित क्षेत्र के लाखों श्रमिकों को रोज़गार मिलता है, बल्कि छोटे दुकानदारों, घरेलू उद्योगों और कारीगरों को भी नई ऊर्जा मिलती है. यह पर्व बाज़ार को महज़ सजाता नहीं, बल्कि चलाता है.

ग्रामीण भारत के लिए बकरीद किसी त्योहार से कहीं ज़्यादा है — यह रोज़गार और आर्थिक अवसर का उत्सव है. देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों की संख्या में बकरा, दुम्बा, ऊँट और भेड़ें ख़रीदी-बेची जाती हैं. इससे पशुपालकों की आय में सीधा इज़ाफ़ा होता है और कई गाँवों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है. स्थानीय हाटों, मंडियों और अस्थायी पशु बाज़ारों में व्यापार की गहमागहमी से न केवल व्यापारी बल्कि मज़दूर, ट्रांसपोर्टर, बिचौलिए और अन्य सहायक सेवाओं से जुड़े लोग भी लाभान्वित होते हैं. वास्तव में, बकरीद जैसे पर्व भारत के आत्मनिर्भर गाँवों की रीढ़ को मज़बूती प्रदान करते हैं.

शहरों और कस्बों में यह त्योहार उत्सव, फैशन और पारिवारिक सौहार्द की रौनक लेकर आता है. मिठाई की दुकानों से लेकर गारमेंट शोरूम, परफ्यूम की दुकानों से लेकर रेडीमेड जूतों और ब्यूटी प्रोडक्ट्स तक — हर स्थान पर बिक्री कई गुना बढ़ जाती है. घरों में पर्दे, क्रॉकरी, सजावटी सामान और गिफ्ट्स की खरीदारी ज़ोरों पर होती है. इस चहल-पहल से न सिर्फ शहरी अर्थव्यवस्था को ऊर्जा मिलती है, बल्कि खुदरा बाज़ारों में भरोसे और उम्मीद की नई रोशनी जगती है, जो त्योहार की आत्मा को पूरक बनाती है.

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक श्री शाहिद सईद ने बकरीद के अवसर पर दिए अपने वक्तव्य में कहा, “जब तक पृथ्वी, चाँद और सूरज हैं, कुर्बानी होती रहेगी. यह केवल जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि इंसान की नीयत, समर्पण और सेवा भावना की कुर्बानी है.” उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम में प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी हराम है, और इस्लाम केवल उसी कुर्बानी को स्वीकार करता है जिसमें नीयत पाक हो और इबादत का भाव हो. उन्होंने यह भी कहा कि कुरबानी का मांस तीन हिस्सों में बाँटने की परंपरा — गरीबों, रिश्तेदारों और स्वयं के लिए — इस्लामी समाज में साझेदारी, करुणा और सेवा का जीवंत उदाहरण है. यह व्यवस्था बताती है कि धर्म का पालन करते हुए भी समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग की भूख और ज़रूरत को प्राथमिकता दी जा सकती है.

कुछ कट्टरपंथी या तथाकथित प्रगतिशील वर्ग द्वारा ‘केक काटने’ जैसे सुझावों को सिरे से खारिज करते हुए शाहिद सईद ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, “यह विचारधारा केवल इस्लामी परंपराओं की उपेक्षा नहीं करती, बल्कि भारत की सहिष्णुता और विविधता पर भी आघात करती है. अगर देश की 74% जनसंख्या मांसाहारी है और मुस्लिम केवल 16% हैं, तो सिर्फ बकरीद पर ही सवाल क्यों उठाए जाते हैं? यह सोच समाज को गुमराह करने और मुस्लिम समुदाय को सांस्कृतिक रूप से अलग-थलग करने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा हो सकती है.” उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे तत्वों को न तो धार्मिक परंपराओं की समझ है, और न ही भारतीय संस्कृति में सबको साथ लेकर चलने की भावना का आदर करना आता है.

बकरीद का सबसे संवेदनशील और मानवीय पक्ष यह है कि इस पर्व पर समाज के लाखों गरीब परिवारों की थाली में पहली बार गोश्त पहुँचता है. कई ऐसे परिवार जो रोज़ दो वक़्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करते हैं, उन्हें इस दिन भरपेट भोजन नसीब होता है. त्योहार पर किए गए इस बँटवारे में वह मानवीय संवेदना समाहित होती है, जो मज़हब की दीवारों से कहीं ऊपर उठकर सामाजिक समानता और भाईचारे की बुनियाद मज़बूत करती है. यह पर्व एक मौक़ा बन जाता है — दिलों को जोड़ने, रिश्तों को गहरा करने और ज़रूरतमंदों के साथ खड़ा होने का.

अंत में, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने देशवासियों से अपील की है कि बकरीद को केवल धार्मिक त्योहार के रूप में न देखें, बल्कि इसे राष्ट्र निर्माण, आर्थिक उत्थान और मानवता की साझेदारी के सुनहरे अवसर की तरह मनाएँ. मंच का यह संदेश — “भारत पहले, इंसानियत सर्वोपरि” — केवल एक नारा नहीं, बल्कि आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है. यह पर्व हमें यह सिखाता है कि धार्मिक आस्थाओं का पालन करते हुए भी हम बाज़ार की मजबूती, समाज की सेवा और राष्ट्रीय एकता की दिशा में ठोस कदम बढ़ा सकते हैं. बकरीद — भारत के लिए केवल कुर्बानी का त्योहार नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द, सेवा भावना और सामाजिक साझेदारी का नया अध्याय है.

Dr. Khalid Raza Khan

Recent Posts

मेंटल हेल्थ के चलते इस दिग्गज गेंदबाज ने लिया संन्यास, 32 की उम्र में क्रिकेट को कहा अलविदा

Craig Miles Retirement: इंग्लैंड के तेज गेंदबाज क्रेग माइल्स ने मानसिक सेहत को प्राथमिकता देते…

16 minutes ago

बाढ़ पीड़ितों से हमदर्दी या खाकी का रोब? छपरा में पिस्टल तानने वाले थानाध्यक्ष पर बड़ी कार्रवाई

Chapra News: बिहार के छपरा (मकेर) में बाढ़ राहत सामग्री वितरण के दौरान हंगामा हो…

30 minutes ago

रानी दुर्गावती की 502वीं जयंती: गृह मंत्री अमित शाह ने गोंडवाना की वीरांगना को किया नमन

Amit Shah: गृह मंत्री अमित शाह ने रानी दुर्गावती की 502वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित…

56 minutes ago

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर साझा किया खास सुभाषित, जानिए इसका मतलब

पीएम नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक प्रेरणादायक संस्कृत सुभाषित साझा किया है, जो…

1 hour ago

ब्रिटेन बेस से उल्टे पांव लौट रही अमेरिकी सेना, अब क्या करेंगे ट्रंप?

Britain Base America Withdraw: ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव और RAF फेयरफोर्ड से जुड़ी…

2 hours ago

साधक की मौत का सच: क्या सोशल मीडिया के ग्लैमर और चेलों की सियासत में उलझे प्रेमानंद महाराज?

Premanand Maharaj News: वृंदावन में प्रेमानंद महाराज के आश्रम में एक युवा साधक की रहस्यमय…

2 hours ago