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BRICS Payment System: BRICS देश SWIFT और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए एक नया इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम तैयार कर रहे हैं. इसका मकसद सदस्य देशों के बीच अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं (local currency) में व्यापार को आसान, सस्ता और तेज़ बनाना है. हालांकि यह रातों-रात SWIFT या IMF की जगह नहीं ले लेगा, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक नया और मजबूत विकल्प जरूर खड़ा होगा.
BRICS देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर SWIFT पर अपनी निर्भरता कम करने और अपनी स्थानीय मुद्राओं (local currency) में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक नया पेमेंट सिस्टम विकसित कर रहे हैं.
BRICS का यह नया एजेंडा ऐसा कोई रातों-रात चलने वाला स्विच नहीं है जो तुरंत SWIFT या IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) को बदल दे. दरअसल, यह एक वित्तीय ढांचे (financial infrastructure) को तैयार करने की कोशिश है, ताकि देशों के बीच पैसों का लेन-देन तेज़, सस्ता और सुरक्षित हो सके, और डॉलर-आधारित बैंकिंग सिस्टम पर निर्भरता कम हो.
कारोबारियों, बैंकों और नीतिकारों के लिए असली कहानी यह नहीं है कि ‘SWIFT खत्म हो गया है’, बल्कि असली बात यह है कि ‘अब बहुत कुछ बदलने वाला है’.
इस पूरी बहस के केंद्र में प्रस्तावित BRICS इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम है. यह शब्द मुख्य रूप से अपनी-अपनी मुद्राओं में भुगतान, डिजिटल फाइनेंस और क्लियरिंग की नई व्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल हो रहा है. सवाल यह है कि क्या ये नए तरीके बिना किसी बड़ी वैश्विक गड़बड़ी के सदस्य देशों के बीच व्यापार आसान बना पाएंगे?
इसे SWIFT की तरह कोई एक तैयार सिस्टम समझने के बजाय कई पहलों और प्रस्तावों का एक नेटवर्क समझना बेहतर होगा. 2024 के कज़ान (Kazan) घोषणापत्र में BRICS देशों ने आपस में बैंकिंग रिश्तों को मजबूत करने, अपनी मुद्राओं में पेमेंट करने और ‘BRICS Clear’ जैसे स्वतंत्र सिस्टम पर काम करने की बात कही थी.
SWIFT खुद पैसे ट्रांसफर नहीं करता; यह बैंकों के बीच एक सुरक्षित मैसेजिंग नेटवर्क है, जिससे 200 से ज्यादा देशों के 11,500 से अधिक बैंक जुड़े हैं. इसलिए BRICS की चुनौती सिर्फ ‘नया ऐप बनाम पुराना नेटवर्क’ नहीं है, बल्कि यह एक नया ऐसा रास्ता बनाने की कोशिश है जो मौजूदा बैंकों और व्यवस्थाओं के साथ-साथ चल सके.
इंटरनेशनल पेमेंट आज भी धीमे, महंगे और कई बिचौलियों पर निर्भर होते हैं- खासकर उभरते हुए बाज़ारों में.
BRICS देशों का मुख्य मकसद डॉलर के उतार-चढ़ाव से बचना, करेंसी कन्वर्जन (करेंसी बदलने) का खर्च कम करना और भू-राजनीतिक तनाव या पाबंदियों (sanctions) के समय अपने व्यापार को सुरक्षित रखना है.
अब BRICS समूह में 11 देश शामिल हो चुके हैं (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात). सदस्यों की संख्या बढ़ने से व्यापार के नए रास्ते तो खुलेंगे, लेकिन नियम-कानून और अलग-अलग मुद्राओं को संभालना भी चुनौतीपूर्ण होगा.
एक मजबूत पेमेंट सिस्टम बनाने के लिए सिर्फ बयानों की नहीं, बल्कि सुरक्षा, कानूनी नियमों और बेहतर तकनीक की ज़रूरत होती है. इसके मुख्य हिस्से इस प्रकार हो सकते हैं:
SWIFT का सबसे बड़ा फायदा उसका व्यापक दायरा, भरोसा और मानकीकरण है. BRICS इसे रातों-रात नहीं बदल सकता.
लेकिन चुनौती यह है कि BRICS यह धारणा तोड़ रहा है कि हर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए पश्चिमी नेटवर्क पर निर्भर रहना ही पड़ेगा. अगर BRICS देश आपस में बड़ा व्यापार बिना SWIFT के करने लगेंगे, तो SWIFT की एकछत्र बादशाहत कम हो जाएगी.
इससे तीन तरह का दबाव बनेगा:
नहीं, बिल्कुल नहीं. IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) एक संस्था है जो देशों की आर्थिक स्थिति पर नज़र रखती है और संकट के समय लोन देती है, जबकि SWIFT सिर्फ एक मैसेजिंग नेटवर्क है.
BRICS के पास IMF जैसा काम करने के लिए पहले से ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) और ‘कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट’ (CRA) मौजूद हैं. नया पेमेंट सिस्टम सिर्फ लेन-देन का एक ढांचा है, यह लोन देने वाली संस्था नहीं है.
एक साझी BRICS करेंसी बनाना बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि इसके लिए सभी देशों को अपनी आर्थिक नीतियां और नीतियां एक जैसी करनी होंगी.
इसकी बजाय, निकट भविष्य में मल्टी-करेंसी सेटलमेंट (Multi-currency settlement) का मॉडल ज्यादा व्यावहारिक है. यानी भारतीय व्यापारी, चीनी सप्लायर या यूएई का बैंक अपनी-अपनी मुद्राओं में सीधा लेन-देन कर सकेंगे और हर बार डॉलर में बदलने की ज़रूरत नहीं होगी.
हालांकि, दुनिया के 89% विदेशी मुद्रा व्यापार में अभी भी अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल होता है, इसलिए इस व्यवस्था को बनने और जमने में समय लगेगा.
संभावित फायदे:
BRICS का यह कदम दुनिया को वित्तीय बहुध्रुवीयता (financial multipolarity) की तरफ ले जा रहा है. SWIFT और डॉलर का दबदबा आज भी मजबूत है, लेकिन BRICS देशों ने विकल्प तैयार करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा दिए हैं.
भविष्य में कोई एक अकेला विजेता नहीं होगा, बल्कि SWIFT, लोकल पेमेंट नेटवर्क, डिजिटल करेंसी और BRICS का यह नया सिस्टम एक साथ मिलकर काम करेंगे. यह कोई अचानक आई क्रांति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के पाइपों की एक धीमी री-वायरिंग (Slow rewiring) जैसा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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