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PM मोदी की आगामी सऊदी अरब की यात्रा, दोनों देशों की द्विपक्षीय साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की तैयारी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस महीने के अंत में होने वाली सऊदी अरब की बहुप्रतीक्षित यात्रा, डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ झटके, बीजिंग के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) डेट ट्रैप, और रूस-यूक्रेन गतिरोध से चिह्नित भू-राजनीति के युग में भारत-सऊदी संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाने में एक और मील का पत्थर साबित होगी.

इन मुद्दों पर करेंगे विचार

प्रधानमंत्री मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) के बीच प्रस्तावित बैठक के केंद्र बिंदु व्यापार, संपर्क, ऊर्जा, सुरक्षा, रक्षा, निवेश, प्रवासी, संस्कृति और सहयोग हैं. प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) महत्वपूर्ण ध्यान आकर्षित करेगा. ट्रम्प के कूटनीतिक मील के पत्थर, अब्राहम समझौते ने IMEC के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया.

ट्रम्प की चुनावी जीत IMEC को करेगा पुनर्जीवित

2020 में उनकी चुनावी हार ने महत्वाकांक्षी संपर्क गलियारे की प्रगति को धीमा कर दिया. पश्चिम एशिया में जो बिडेन के कुप्रबंधन ने इसकी नाजुकता को बढ़ा दिया. 7 अक्टूबर को निर्दोष इजरायलियों पर हमास का हमला, इजरायल-हमास युद्ध, इजरायल पर ईरान के मिसाइल हमले, हिजबुल्लाह और हौथी व्यवधान और सीरियाई संकट ने पश्चिम एशियाई भू-राजनीति को जटिल बना दिया. हिंसक गतिविधियों के इस भंवर के बीच, IMEC को चुपचाप टाल दिया गया. 2025 में ट्रम्प की चुनावी जीत IMEC को पुनर्जीवित करेगी. सऊदी अरब IMEC परियोजना में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है.

दूरदर्शी नेतृत्व

सऊदी अरब में कुल प्रवासी आबादी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बनाने वाला 2.7 मिलियन भारतीय समुदाय नई दिल्ली और रियाद के बीच एक जीवंत कड़ी है. मोदी ने दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध बनाने के लिए इस सॉफ्ट पावर की ताकत का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया है. 2016 और 2019 में उनकी यात्राओं ने भारत में बड़े पैमाने पर निवेश लाया. सऊदी अरब में भारतीय व्यापार, वाणिज्य और सांस्कृतिक पैठ ने 2016 से पहले कभी इतनी ऊंचाई नहीं देखी थी. दो प्रभावशाली राजनेताओं और दूरदर्शी नेताओं के रूप में मोदी-एमबीएस का अनूठा व्यक्तिगत समीकरण भारत-सऊदी अरब द्विपक्षीयता की मुख्य ताकत को रेखांकित करता है. एमबीएस का विज़न 2030 सऊदी अरब को व्यापक विकास और समृद्धि की ऊँचाई पर ले जाने के लिए सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है.

द्विपक्षीय यात्रा

पीछे मुड़कर देखें तो, सऊदी अरब के साथ भारत के राजनयिक संबंध 1947 में शुरू हुए, ब्रिटिश उपनिवेशवाद से इसकी स्वतंत्रता के तुरंत बाद. 1970 के दशक में तेल की उछाल और बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए तेल ड्रिलिंग की बढ़ती मांग ने कुशल और अकुशल दोनों तरह के मजबूत कार्यबल को जन्म दिया. रेगिस्तान जल्द ही अवसरों की भूमि में बदल गया. 1970 के दशक में खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों का पतला प्रवाह असाधारण रूप से प्रवाहित हुआ. कार्यबल की मांग ने प्रवाह को तेज कर दिया. दिल्ली घोषणापत्र पर 2006 में किंग अब्दुल्ला की भारत यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे. 2010 में मनमोहन सिंह की सऊदी यात्रा के दौरान रियाद घोषणापत्र के साथ दोनों मित्र देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत किया गया.

व्यापार और निवेश वास्तुकला

सितंबर 2023 में जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए एमबीएस की भारत यात्रा में ऊर्जा, बैंकिंग, निवेश, विनिर्माण, अभिलेखीय सहयोग, भ्रष्टाचार विरोधी और जल विलवणीकरण पर समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए. इसने बढ़ती साझेदारी और बहुक्षेत्रीय सहयोग को रेखांकित किया. उपरोक्त कहानी बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों को दर्शाती है. व्यापार, वाणिज्य और संस्कृति के सूचकांक उल्लेखनीय रूप से बढ़ रहे हैं. भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, जबकि सऊदी अरब पाँचवाँ सबसे बड़ा है. रियाद स्थित भारतीय दूतावास ने निर्दिष्ट किया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 42.98 बिलियन डॉलर था. भारतीय निर्यात 11.56 बिलियन डॉलर था, जबकि आयात 31.42 बिलियन डॉलर था.

-भारत एक्सप्रेस

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