8 साल तक भरा प्रीमियम, 2 लाख के इलाज पर Policybazaar ने रिजेक्ट किया क्लेम (इमेज- सोशल मीडिया)
Policybazaar Claim Controversy: सोचिए आप करीब 8 साल तक लगातार अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का प्रीमियम भरते रहें. बीमारी आए तो इलाज के लिए पॉलिसी पर भरोसा करें, अस्पताल में भर्ती हों, सारे दस्तावेज समय पर जमा करें और कंपनी की जांच भी पूरी हो जाए. इसके बावजूद करीब एक महीने बाद आपका क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया जाए कि आपने यह साबित नहीं किया कि अस्पताल जाकर इलाज क्यों नहीं कराया.
दरअसल यह दावा सोशल मीडिया पर गौरव वर्मा नाम के एक व्यक्ति ने किया है. वीडियो में गौरव बताते हैं कि उन्होंने Policybazaar के जरिए Niva Bupa की पॉलिसी ली थी और पिछले 7-8 साल से नियमित रूप से इसका प्रीमियम भर रहे हैं. पिछले साल उन्हें पैनक्रियाटाइटिस की बीमारी का पता चला. उन्होंने एलोपैथिक इलाज की जगह आयुर्वेदिक उपचार कराने का फैसला किया और उत्तराखंड के रुद्रपुर में करीब 21 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे.
गौरव के मुताबिक डिस्चार्ज होने से पहले ही उन्होंने बीमा कंपनी को अपने इलाज की जानकारी दे दी थी. उनका कहना है कि उन्होंने Policybazaar के केयर मैनेजर से भी मदद मांगी, लेकिन करीब पांच दिन तक कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने जांच रिपोर्ट, डिस्चार्ज समरी, अस्पताल के बिल समेत सभी जरूरी दस्तावेज कंपनी को उपलब्ध कराए. उनका कहना है कि क्लेम रजिस्टर हुआ, वेरिफिकेशन टीम उनके घर भी पहुंची और प्रक्रिया आगे बढ़ती रही.
गौरव पिछले 7/8 साल से Policybazaar के ज़रिए ली गई Niva Bupa पॉलिसी का प्रीमियम भर रहे हैं।
पिछले साल उन्हें पैनक्रियाटाइटिस डिटेक्ट हुआ।
एलोपैथिक की बजाय आयुर्वेदिक इलाज चुना, उत्तराखंड के रुद्रापुर में 21 दिन एडमिट रहे।
डिस्चार्ज से पहले ही कंपनी को कॉल करके बता दिया था,… pic.twitter.com/zUrMRPrGM1
— Rahul Kumar (@MukAn_X) September 14, 2026
लेकिन करीब 30 से 32 दिन बाद उनका क्लेम खारिज कर दिया गया. गौरव के मुताबिक, कंपनी की ओर से वजह बताई गई कि वह यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि उन्होंने अस्पताल में इलाज क्यों नहीं कराया.
गौरव का कहना है कि यह तर्क उन्हें इसलिए हैरान करने वाला लगा, क्योंकि उनकी पॉलिसी में 24 घंटे अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में आयुष उपचार के तहत आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथिक और नेचुरोपैथी इलाज के कवर का प्रावधान है.
गौरव के मुताबिक कंपनी की मांग पर उन्होंने दोबारा दस्तावेज जमा किए. उनका दावा है कि कंपनी की ओर से बार-बार वही कागजात मांगे जाते रहे. उन्होंने 20 से ज्यादा ईमेल किए और ग्रीवेंस पोर्टल पर चार बार क्लेम के पुनर्विचार की मांग रखी. मामला अब बीमा लोकपाल तक पहुंच चुका है.
गौरव के मुताबिक, इलाज में करीब 2 लाख रुपये खर्च हुए और हर महीने लगभग 19 हजार रुपये की दवाइयों का खर्च अलग है. उनका आरोप है कि पिछले कई महीनों से इलाज के साथ-साथ उन्हें लगातार मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ रही है.
गौरव का यह भी आरोप है कि Policybazaar के कुछ एजेंटों ने उनसे कहा कि वे केवल पॉलिसी बेचने वाले बिचौलिए हैं और क्लेम अप्रूवल में उनकी कोई भूमिका नहीं है.
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उनका कहना है कि वह इस मामले को लेकर पहले भी दो बार आवाज उठा चुके हैं. कंपनी की ओर से मैसेज के जरिए कार्रवाई का भरोसा भी मिला, लेकिन उनके मुताबिक अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है. हालांकि, इस मामले में Niva Bupa और Policybazaar का पक्ष सामने आना बाकी है.
(ये खबर सोशल मीडिया पर किए गए दावों के आधार पर लिखी गई है, भारत एक्सप्रेस का इससे कोई संबंध नहीं है)
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