Ambernath Municipal Election: अभिषेक पांडे/मुंबई: महाराष्ट्र के अंबरनाथ महानगरपालिका में राजनीति का एक ऐसा अध्याय लिखा गया है, जिसने सभी को चौंका दिया है. यहां कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से ‘साफ’ हो गई है. दरअसल, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को सत्ता से दूर रखने के लिए बीजेपी और कांग्रेस के बीच एक अघोषित गठबंधन हुआ था, जिससे दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व नाराज थे. कांग्रेस आलाकमान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपने 12 पार्षदों को निलंबित कर दिया. लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया. सस्पेंड होते ही इन सभी पार्षदों ने बीजेपी का दामन थाम लिया.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने ठाणे में देर रात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बड़े सियासी बदलाव की पुष्टि की. उन्होंने ऐलान किया कि कांग्रेस के ये सभी 12 पार्षद अब बीजेपी का हिस्सा होंगे. इस घटनाक्रम के बाद अंबरनाथ महानगरपालिका अब व्यावहारिक रूप से ‘कांग्रेस मुक्त’ हो गई है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने इस चाल से न केवल कांग्रेस को खत्म किया, बल्कि एकनाथ शिंदे के गुट को भी सत्ता के समीकरणों से पूरी तरह बाहर कर दिया है.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने ठाणे में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कर दिया कि कांग्रेस से चुने गए 12 पार्षद अब औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. उन्होंने बताया कि अगले दो-तीन दिनों में जॉइनिंग की कागजी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी. चव्हाण ने दावा किया कि ये पार्षद ‘अंबरनाथ के विकास’ के मुद्दे पर बीजेपी के साथ आए हैं. इस मौके पर कांग्रेस से निलंबित अंबरनाथ ब्लॉक अध्यक्ष प्रदीप पाटिल भी मौजूद थे.
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा बेहद नाटकीय रही. शुरुआत में अंबरनाथ में बीजेपी और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने हाथ मिला लिया था, जिस पर उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis on Ambernath) ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी. इसके बाद गठबंधन टूटा और कांग्रेस ने अपने पार्षदों को सस्पेंड कर दिया. लेकिन बीजेपी ने आपदा को अवसर में बदल लिया. सस्पेंडेड पार्षदों को अपनी पार्टी में मिलाकर बीजेपी ने अपनी संख्या बल बढ़ा ली. इसका सीधा नुकसान एकनाथ शिंदे गुट को हुआ है.
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अंबरनाथ का यह राजनीतिक ड्रामा बीजेपी के लिए ‘विन-विन’ सिचुएशन लेकर आया है. जहां एक तरफ उसने अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को शहर से मिटा दिया, वहीं गठबंधन सहयोगी होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर प्रतिद्वंद्वी शिंदे गुट को भी मात दे दी. 12 पार्षदों का पाला बदलना यह साबित करता है कि स्थानीय निकाय चुनावों में विचारधारा से ऊपर ‘सत्ता और समीकरण’ हावी रहते हैं. अब देखना होगा कि शिंदे गुट इस ‘धोबी पछाड़’ दांव पर क्या प्रतिक्रिया देता है.
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