अमेरिका पर लंबे समय से ये आरोप लगते रहे हैं कि वो दुनिया भर में तनाव बढ़ाकर, हथियार सप्लाई करके फिर मध्यस्थ बनकर और आखिर में युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में मुनाफा कमाकर अपना दबदबा कायम करता है. रूस-यूक्रेन युद्ध इसका ताजा उदाहरण है. वहीं भारत ने इस अमेरिकी मॉडल को अपनाने से साफ इनकार कर दिया है.
रूस-यूक्रेन मामले में भी यही हुआ. अमेरिका ने यूक्रेन को NATO में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे रूस को खतरा महसूस हुआ और उसने हमला कर दिया. इसके बाद अमेरिका ने यूक्रेन को हथियार दिए रूस पर प्रतिबंध लगाए और अब अमेरिकी कंपनियां वहां पुनर्निर्माण के लिए तैयार हैं.
डोनाल्ड ट्रंप ने तो दावा किया कि वो 24 घंटे में युद्ध खत्म कर सकते हैं लेकिन इसके पीछे उनका मकसद सिर्फ शांति नहीं बल्कि अमेरिका को फिर से वैश्विक नेता बनाना है.
जब भारत-पाक तनाव बढ़ा तो ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश की. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कह दिया कि ये मामला पूरी तरह द्विपक्षीय है और किसी तीसरे देश की जरूरत नहीं है. इससे भारत ने अमेरिकी मॉडल को दक्षिण एशिया में लागू होने से रोक दिया.
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भारत की ये नीति दिखाती है कि कैसे एक देश अपनी संप्रभुता बनाए रखते हुए वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा रह सकता है. आज के बहुध्रुवीय विश्व में भारत का ये रुख बाकी देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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