हर साल 1 अप्रैल आते ही लोग अपने दोस्तों, परिवार और कभी-कभी अजनबियों को भी हंसी-मजाक में फंसाने लगते हैं. किसी के व्हाट्सऐप पर मज़ेदार मैसेज भेज देना, किसी के बैग में हंसी-मज़ाक वाली चीज़ रखना, या कुछ ऐसा करना जिससे सामने वाला थोड़ा चौंक जाए और फिर हंस पड़े यही है अप्रैल फूल्स डे.
यह दिन बस एक हल्का-फुल्का मिज़ाज लेकर आता है, जब दुनिया थोड़ी मुस्कुराती है और तनाव भूल जाता है.
अप्रैल फूल्स डे की कहानी काफी पुरानी है. इतिहासकारों का कहना है कि इसकी शुरुआत 16वीं सदी के फ्रांस से हुई थी. 1582 में फ्रांस ने जूलियन कैलेंडर छोड़कर ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाया. जूलियन कैलेंडर में नया साल अप्रैल के आसपास आता था, जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर में 1 जनवरी को नया साल शुरू होता है.
जो लोग इस बदलाव की खबर से अनजान थे, वे पुराने तरीके से अप्रैल में ही नए साल का जश्न मनाते रहे. इन्हें मज़ाक में ‘अप्रैल फूल’ कहा जाने लगा. धीरे-धीरे यह परंपरा मज़ाक और प्रैंक की आदत में बदल गई. शुरुआत में तो कभी-कभी इन लोगों पर कागज़ की मछली भी चिपका दी जाती थी, जिसका मतलब था ‘तुम आसानी से फंस जाते हो.’
समय के साथ यह परंपरा यूरोप के बाकी देशों में फैल गई और फिर दुनिया के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गई. अब अप्रैल फूल्स डे सिर्फ हंसी और हल्के प्रैंक का दिन बन गया है. स्कूल, कॉलेज या ऑफिस में छुट्टी न भी हो, लोग इस दिन का मज़ा लेने से पीछे नहीं हटते.
भारत में अप्रैल फूल्स डे की शुरुआत अंग्रेजों के समय हुई. आज यह काफी पॉपुलर हो चुका है. दोस्तों के बीच मज़ेदार मैसेज भेजना, सोशल मीडिया पर प्रैंक वीडियो शेयर करना, या ऑफिस में मज़ाक करना सबका हिस्सा बन गया है. इस दिन हर कोई थोड़ा चंचल और हंसमुख हो जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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