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Pulwama Attack Revenge: 14 फरवरी की वो काली दोपहर आज भी हर हिंदुस्तानी के जहन में एक गहरे जख्म की तरह ताजा है, जब पुलवामा में हमने अपने 40 वीर जवानों को खो दिया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस खौफनाक हमले की शाम ही दिल्ली के सत्ता गलियारों में बदले की पटकथा लिख दी गई थी? सरकार ने उसी वक्त सेना और खुफिया एजेंसियों को साफ मैसेज दे दिया था कि इस बार जवाब सिर्फ कड़ा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक होगा. दिलचस्प बात यह है कि आतंकियों को धूल चटाने के लिए जिस ‘बालाकोट’ को चुना गया, उसका एक गहरा नाता शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह से भी जुड़ा है.
पुलवामा हमले के बाद भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) को एक ऐसा ठिकाना खोजने का काम सौंपा गया, जहां आतंकियों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचे. राहुल पंडिता की किताब ‘दि लवर ब्वॉय ऑफ बहावलपुर’ के मुताबिक, एजेंसियों ने तीन विकल्प दिए थे. पहला विकल्प एलओसी के पास का एक कैंप था, जिसे सरकार ने यह कहकर ठुकरा दिया कि “यह फिर से उरी जैसी सर्जिकल स्ट्राइक बन जाएगी, हमें कुछ बड़ा करना है.” दूसरा ठिकाना रिहायशी इलाके के पास था, जिससे आम नागरिकों की जान को खतरा हो सकता था. आखिर में नजर टिकी बालाकोट की पहाड़ी पर स्थित जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंप पर.
बालाकोट को चुनने के पीछे सिर्फ सामरिक कारण नहीं थे, बल्कि इसका एक प्रतीकात्मक इतिहास भी था. दरअसल, इसी बालाकोट की धरती पर साल 1831 में महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना ने सैयद अहमद बरेलवी नाम के एक जिहादी को मौत के घाट उतारा था. बरेलवी उस दौर में भी आज के आईएसआईएस (ISIS) जैसा एक कट्टरपंथी इस्लामी साम्राज्य खड़ा करना चाहता था और उसने सिखों के खिलाफ जिहाद छेड़ा था. बरेलवी को वहीं दफनाया गया था और जैश जैसे संगठन उसे अपना आदर्श मानते थे. उसी जगह पर दोबारा हमला करना आतंकियों के मनोबल को तोड़ने के लिए सबसे सटीक संदेश था.
हैरानी की बात यह है कि उस वक्त सरकार के सामने भगोड़े अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम को ठिकाने लगाने का विकल्प भी रखा गया था. खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, बालाकोट स्ट्राइक की आहट से कराची में बैठा दाऊद बुरी तरह घबराया हुआ था और इस्लामाबाद भागने की फिराक में था. हालांकि, लंबी चर्चा के बाद यह तय हुआ कि दाऊद अब बीता हुआ कल है और उसे मारने से आतंकियों को वो कड़ा संदेश नहीं जाएगा, जिसकी इस वक्त जरूरत है. सरकार का पूरा ध्यान सीधे आतंकी फैक्ट्री को तबाह करने पर था.
आखिरकार 26 फरवरी की सुबह भारतीय वायुसेना के मिराज-2000 विमानों ने बालाकोट में जैश के उस कैंप पर कहर बरपाया. सटीक बमबारी ने आतंकी ट्रेनिंग सेंटर की इमारतों को खंडहर बना दिया. हालांकि पाकिस्तान ने हमेशा मरने वालों की संख्या छुपाई, लेकिन खुफिया सूत्रों की मानें तो अस्पतालों में बड़ी संख्या में घायल आतंकी पहुंचे थे, जिनमें से कइयों ने इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ दिया.
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-भारत एक्सप्रेस
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