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मात्र 3% हरियाली और अंधाधुंध खनन! जानिए कैसे इंसानी गलतियों ने बांदा को बना दिया तपता हुआ आईलैंड

Banda Hottest City: वीरों की धरती कहा जाने वाला बुंदेलखंड आज तप रहा है. चारों तरफ भट्टी जैसी तपिश और लू ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है. इसके एक जिले बांदा में तो ये हालात हैं कि दिन तो दिन, लोग रात में भी घरों से बाहर निकलना छोड़ दिये हैं. बांदा को एक महीने में तीन बार दुनिया का सबसे गर्म शहर घोषित किया जा चुका है. बुधवार को यहां तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसने पिछले 75 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया. इसके साथ ही बुधवार, मई महीने में बीते 75 सालों का सबसे गर्म दिन बन गया. दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं कि आखिर यूपी का यह इलाका इतना गर्म क्यों हो रहा है?

बांदा इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है. IMD के मुताबिक बुधवार की दोपहर यहां 48.2 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया. इससे पहले बांदा में सबसे ज्यादा तापमान साल 2019 में रिकॉर्ड किया गया था. 10 जून 2019 को बांदा का पारा 49.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बांदा में तापमान का बढ़ना कोई मौसमी घटना नहीं बल्कि इसके लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार है. यहां की बंजर और पथरीली जमीन, लगातार हो रहे अवैध खनन, सूखती नदियां और कम होती हरियाली इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है. इन सब कारणों के चलते बांदा एक हीटलैंड में बदल गया है.

राजस्थान की तरफ से आ रही गर्म हवाएं

भारतीय मौसम विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बुंदेलखंड के इस इलाके में राजस्थान की तरफ से आ रही गर्म और कठोर हवाएं तापमान बढ़ोतरी के लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं.

साफ आसमान होने की वजह से सूरज की किरणें सीधे बांदा की पथरीली जमीन से टकरा रही हैं. जिससे हीट ट्रैप हो जा रहा है. पथरीली जमीन होने के चलते ये तापमान को धीरे-धीरे रिलीज करती है, इसलिए यह गर्मी रात में भी बनी रहती है.

अवैध खनन भी है जिम्मेदार

बांदा भौगोलिक और मानवीय गतिविधियों की वजह से एक भट्ठी में तपते आईलैंड में बदल चुका है. पेड़-पौधों की कमी और नदियों के घटते जल स्तर ने बांदा को एक गर्मी के दुष्चक्र में फंसा दिया है.

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बुंदेलखंड के इस जिले में हरित आवरण (पेड़-पौधों का प्रतिशत) मात्र 3 प्रतिशत है. जबकि बांदा का कुल क्षेत्रफल 105 वर्ग किलोमीटर है. ऐसे में यहां गर्मी सीधे जनजीवन को प्रभावित कर रही है. पेड़-पौधों की कमी के चलते जिले के भू-जल स्तर में भी जबरदस्त कमी हो रही है. जिसने इस स्थिति को और बदतर बना दिया है.

-भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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