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‘हमने तो कुछ मांगा ही नहीं’… जानिए कैसे इस एक झूठ की आड़ में बिक रही हैं कामकाजी बेटियां

Dowry 2.0: आज के दौर में दहेज का पारंपरिक रूप बदलकर ‘Dowry 2.0’ हो चुका है. अब सीधे तौर पर कैश या गाड़ी नहीं मांगी जाती, बल्कि ‘आपसी सहयोग’ (Mutual support) और ‘पार्टनरशिप’ (partnership) के नाम पर कामकाजी बहुओं की सैलरी, लोन की EMI और घरेलू खर्चों के जरिए उनका आर्थिक और भावनात्मक शोषण किया जाता है.

आखिर क्या है दहेज 2.0?

दहेज का पारंपरिक रूप अब बदल चुका है. पहले जहां शादी से पहले गाड़ी, कैश या गहनों की साफ मांग होती थी, वहीं आज का ‘Dowry 2.0’ बेहद शातिर है. अब आधुनिक और पढ़े-लिखे परिवारों में सीधे पैसे नहीं मांगे जाते, बल्कि ‘थोड़ी मदद’ या ‘आपसी सहयोग’ (mutual support) जैसे भावनात्मक शब्दों की आड़ ली जाती है.

कामकाजी महिलाओं पर शादी के बाद पति के एजुकेशन लोन की EMI भरने, घर या कार की किस्तें चुकाने और परिवार के अन्य खर्च उठाने का दबाव बनाया जाता है. इसे ‘पारिवारिक जिम्मेदारी’ (family responsibility) का ऐसा मुखौटा पहनाया जाता है कि मना करने पर लड़की को ही अपराधी (गिल्ट) महसूस कराया जाता है.

‘हमने तुम्हें बेटी माना’ जैसे वाक्यों से तोड़ते

यह कड़वी सच्चाई बड़े शहरों के हाई-प्रोफाइल और कॉर्पोरेट परिवारों में भी धड़ल्ले से जारी है, जहां लड़की की सैलरी को उसकी निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि ससुराल की ‘संपत्ति’ (Property) मान लिया जाता है. इस नए दहेज का सबसे खतरनाक पहलू इसका भावनात्मक और कानूनी रूप से सुरक्षित होना है.

मारपीट के बजाय यहां ‘हमने तुम्हें बेटी माना’ जैसे वाक्यों से मानसिक रूप से तोड़ा जाता है. कोर्ट में भी इसे ‘म्यूचुअल सपोर्ट’ कहकर आसानी से छिपा दिया जाता है. जब तक समाज इस नए वित्तीय शोषण को नहीं पहचानेगा, यह दानव शादियों को लीलता रहेगा.

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-भारत एक्सप्रेस 

Shubhra Rai

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