Ahmedabad Plane Crash: एयर इंडिया का बोइंग विमान 787-8 ड्रीमलाइनर, टेकऑफ के कुछ सेकंड के अंदर अहमदाबाद के मेघानी नगर स्थित बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल पर जा गिरा. इस प्लेन में 242 लोग सवार थे, जिसमें से सिर्फ विश्वास कुमार नाम का एक व्यक्ति ही जिंदा बच पाया है.
अब अहमदाबाद प्लेन क्रैश को लेकर सारी जांच पड़ताल की जा रही है. जांच एजेंसियों को प्लेन का एक ब्लैक बॉक्स मिल चुका है. अब ब्लैक बॉक्स ढूंढने के बाद उसे डिकोड करने में कुछ समय लगेगा. एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 के क्रैश के कारणों का पता लगाने के लिए एविएशन एक्सपर्ट जांच करेंगे, जिसमें ब्लैक बॉक्स और उसका विश्लेषण भी शामिल है.
एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) ने पहले ही इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) द्वारा तय किए गए अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के तहत औपचारिक जांच शुरू कर दी है. चलिए अब आपको बताते हैं कि जब कोई हवाई दुर्घटना होती है, तब जांच कैसे की जाती है.
सबसे पहले होती है ब्लैक बॉक्स की तलाश और उसकी जांच. प्लेन क्रैश होने के बाद अगर पानी में FDR और CVR (फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर) मिलते हैं तो इसकी रिकवरी में कई चुनौतियां होती हैं. अगर कोई रिकॉर्डर पानी में मिला है, तो उसे ज़ंग से बचाने के लिए पानी में ही रखा जाता है. विशेषज्ञों की माने तो रिकॉर्डर को डिअयोनाइज्ड पानी में रखना नुकसान को कम करता है जब तक कि वो लैब नहीं पहुंचता.
जब फ्लाइट रिकॉर्डर लैब में पहुंचते हैं, तो विशेषज्ञ सबसे पहले उनकी हालत जांचते हैं कि डेटा निकाला जा सकता है या नहीं. अगर रिकॉर्डर सही सलामत हो, तो आमतौर पर डेटा आसानी से डाउनलोड हो जाता है, लेकिन अगर वो डैमेज हो तो ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.
सबसे ज़रूरी हिस्सा होता है क्रैश सेफ मेमोरी यूनिट (CSMU), जिसमें अहम फ्लाइट डेटा होता है. अगर ज़रूरत हो, तो विशेषज्ञ डेटा चिप्स को “गोल्डन चैसिस” नाम के एक खास डिवाइस में शिफ्ट करते हैं, जो डेटा को सुरक्षित रखने और डाउनलोड करने के लिए बनाया जाता है.
फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर में सैकड़ों तरह के पैरामीटर होते हैं जिन्हें जांचकर ये समझने की कोशिश की जाती है कि हादसे से पहले क्या हुआ. वहीं, कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) में पायलट की बातचीत और कॉकपिट की बाकी आवाज़ें रिकॉर्ड होती हैं.
इसका मुख्य मकसद होता है ये पता लगाना कि हादसा रिकॉर्ड हुआ था या नहीं और उससे क्या-क्या जानकारी मिल सकती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि CVR की रिकॉर्डिंग कानूनी रूप से सुरक्षित होती है. फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर में विमान के सिस्टम से जुड़ी सैकड़ों जानकारियां होती हैं, जिनसे जांचकर्ताओं को ये समझने में मदद मिलती है कि हादसे से पहले क्या हुआ था. वहीं, कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) पायलट की बातचीत और बाकी ज़रूरी आवाज़ें रिकॉर्ड करता है.
बड़े हादसों के मामले में, जैसे अहमदाबाद में हुआ है, एक टीम मलबे की जांच, वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी के लिए भेजी जाती है. मलबा जांच के लिए लैब में भी भेजा जाता है. जांच के नतीजों से लैंडिंग के समय के प्रभाव, गति, वेग और कोण जैसी जानकारियां मिल सकती हैं. लेकिन जब विमान पूरी तरह जलकर राख हो जाता है या बहुत ज़्यादा जल जाता है, तो मलबे की जांच से ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती. यहां तक कि पैसेंजर सीटें, प्रोपेलर और पंख भी जांचकर्ताओं की मदद कर सकते हैं.
इन सबके बाद अगला कदम होता है ‘कोर्ट ऑफ इंक्वायरी’ यानी जांच अदालत का गठन, जिसमें तीन सदस्य होते हैं. ये समिति मामले की सुनवाई करती है, जिसमें चश्मदीदों के बयान, जीवित बचे लोगों की गवाही, इंजीनियरों, एयरलाइन के सीईओ, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और हादसे से जुड़े सभी लोगों की बात सुनी जाती है.
जब सभी डेटा का विश्लेषण पूरा हो जाता है, तब निष्कर्षों को एक अंतिम रिपोर्ट में शामिल किया जाता है जिसे सार्वजनिक किया जाता है. इस रिपोर्ट में हादसे का तथ्यात्मक सारांश, तकनीकी निष्कर्ष, फ्लाइट डेटा का विश्लेषण, कॉकपिट ऑडियो, आधिकारिक बयान, हादसे का संभावित कारण और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए सुरक्षा सिफारिशों की सूची शामिल होती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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